केंद्र की उदासीनता पर तिवारी का तीखा हमला; कहा: मेट्रो के बिना 2036 तक चंडीगढ़ बन सकता है ‘ट्रैफिक का नरक’

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बेकाबू ट्रैफिक चंडीगढ़ के भविष्य को अपंग कर सकता है: एम.पी चंडीगढ़

मेट्रो को रणनीतिक लाइफलाइन घोषित कर केंद्र 25,000 करोड़ रुपये की विशेष सहायता दे: तिवारी

नई दिल्ली/चंडीगढ़, 19 फ़रवरी : चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी ने केंद्र सरकार की उदासीनता पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है कि उनकी लगातार कोशिशों के बावजूद शहर का सबसे अहम प्रोजेक्ट चंडीगढ़ मेट्रो कहीं आगे बढ़ता नहीं दिख रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मेट्रो रेल प्रणाली लागू नहीं हुई, तो 2036 तक चंडीगढ़ की ट्रैफिक स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकेगी और शहर ‘ट्रैफिक का नरक’ बनकर रह जाएगा, जहां जाम शहर की गतिशीलता और विकास दोनों को जकड़ लेंगे।

तिवारी ने याद दिलाया कि हाल ही में 11 दिसंबर को उन्होंने लोकसभा के शून्यकाल में यह मुद्दा उठाया था और चंडीगढ़ के लिए मेट्रो रेल की तात्कालिक आवश्यकता पर जोर दिया था। इस पर जवाब देते हुए, केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा था कि 28 अप्रैल 2023 को यूनिफ़ाइड मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (यूएमटीए) के गठन के बावजूद भारत सरकार को चंडीगढ़ प्रशासन, पंजाब या हरियाणा सरकारों की ओर से चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली और न्यू चंडीगढ़ के लिए किसी भी मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (एमआरटीएस) का प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, तिवारी ने आश्चर्य जताया कि पिछले 34 महीनों में यूएमटीए ने आखिर किया क्या, जबकि आरआईटीईएस पहले ही मेट्रो परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता दर्शाती दो रिपोर्टें सौंप चुका है। इसके बावजूद राज्यों या प्रशासन की ओर से केंद्र को कोई प्रस्ताव न भेजा जाना गंभीर लापरवाही है।

जकी मंत्री द्वारा शहरी परिवहन को केंद्र शासित प्रदेश या संबंधित राज्यों का विषय बताकर केंद्र की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने पर, तिवारी ने कहा कि ‘कोई प्रस्ताव नहीं मिला’ का तर्क देकर मंत्रालय अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है और चंडीगढ़ के ट्रैफिक संकट की गंभीरता को नज़रअंदाज़ कर रहा है। मंत्री के विस्तृत उत्तर से स्पष्ट है कि यह महज अफसरशाही स्तर की टालमटोल है। शहर के भविष्य के लिए अहम परियोजना की जिम्मेदारी लेने के बजाय कार्रवाई से बचने के बहाने स्वीकार्य नहीं हैं।

तिवारी ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि समस्या कागजी कार्रवाई की नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति’ की कमी की है। चंडीगढ़ के लोगों को बहाने नहीं, समाधान चाहिए। नेतृत्व का अर्थ पहल करना होता है, जिम्मेदारी टालना नहीं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि देश के 18 शहरों में मेट्रो निर्माण पूरा हो चुका है, इसलिए चंडीगढ़ के लिए भी मेट्रो की तात्कालिक आवश्यकता है।

इस दौरान मेट्रो रेल परियोजना की अहमियत रेखांकित करते हुए, तिवारी ने कहा कि चंडीगढ़ और इसके आसपास के शहरों में आबादी और वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। न्यू चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला से हर दिन हजारों लोग काम के लिए चंडीगढ़ आते हैं, जिससे पहले से दबाव में सड़कों के नेटवर्क पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। वर्षों से एकीकृत, आधुनिक सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की जरूरत महसूस की जा रही है। मेट्रो से न केवल ट्रैफिक घटेगा, बल्कि प्रदूषण में कमी, ईंधन की बचत और ट्राई-सिटी के लिए टिकाऊ परिवहन समाधान भी मिलेगा।

तिवारी ने केंद्र से मांग की कि चंडीगढ़ मेट्रो को तत्काल ‘स्ट्रैटेजिक कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट’ घोषित कर 25,000 करोड़ रुपये की विशेष अनुदान राशि मंजूर की जाए। उन्होंने कहा कि परियोजना लागत योजना चरण के 16,000 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 25,000 करोड़ रुपये हो चुकी है और देरी से यह और महंगी होगी। केंद्र सरकार को चंडीगढ़ मेट्रो को एक ‘रणनीतिक लाइफलाइन’ के रूप में देखना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय एकीकरण और आर्थिक संभावनाओं को खोला जा सके। केंद्र द्वारा 25,000 करोड़ रुपये के बजट समर्थन से ही यह लंबे समय से लंबित परियोजना कागज़ से ज़मीन पर उतर सकेगी।

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