जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की वजह यह है ? …जानिए इनसाइड स्टोरी

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नई दिल्ली : सदन से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक मुखर रहने वाले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे को देश की राजनीति के जानकार अनायास नहीं मान रहे हैं। खुलकर तो नहीं, लेकिन कुछ इसे एनडीए की बड़ी और चौंकाने वाली राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं तो कुछ इसे भाजपा के साथ लगातार बिगड़ते कदमताल और नाराजगी की देन मान रहे हैं।

बहरहाल, धनखड़ के इस्तीफा सीधे तौर पर किसी के भी गले नहीं उतर रहा है। उसकी बड़ी वजह यह है कि सत्र शुरू होते ही इस्तीफा देने की कोई तात्कालिक बड़ी वजह धनखड़ के सामने नहीं थी। उन्होंने भले ही सेहत को वजह बताया लेकिन यह वजह भी ऐसी नहीं थी जिससे रात में न सिर्फ इस्तीफा दिया जाए और तत्काल स्वीकार करने का आग्रह भी साथ हो। लिहाजा उपराष्ट्रपति के इस्तीफे की टाइमिंग पर कई अटकलों ने भी जन्म लेना शुरू कर दिया है।

सरकार-धनखड़ के बीच सब कुछ ठीक?

दिल्ली के सियासी गिलयारों में इस्तीफे के बाद छनकर सामने आ रहीं जानकारियों पर गौर किया जाए तो उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ सरकार और संगठन के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। धनखड़ पिछले कुछ दिनों से किसानों के मुद्दों को लेकर सरकार के रुख से सहमत नहीं थे। उन्होंने ये मुद्दा सार्वजनिक मंच से भी उठाया था। बावजूद वे इसे सहज हल होने वाले मुद्दों की तरह लेते चले आ रहे थे।

पहले दिन सदन में दिखी पूरी सक्रियता

मानसून सत्र के पहले दिन भी धनखड़ पूरी सक्रियता से संसद में दिखे। संसद में उन्होंने कई मीटिंग भी ली। सोमवार शाम 6 बजे जगदीप धनखड़ ने विपक्ष के सांसदों से मुलाकात भी की थी। इस दौरान उन्होंने खराब स्वास्थ्य का कोई जिक्र नहीं किया था। यही नहीं, जगदीप धनखड़ का ये फैसला इसलिए भी पच नहीं रहा है क्योंकि उनके आगे के कार्यक्रम भी प्रस्तावित थे।

बुधवार के लिए भी प्रस्तावित था कार्यक्रम

23 जुलाई को धनखड़ का जयपुर दौरा प्रस्तावित था। जहां उपराष्ट्रपति रियल एस्टेट डेवलपर्स संघ के साथ संवाद करने वाले थे। उपराष्ट्रपति सचिवालय की ओर से इस कार्यक्रम को लेकर प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की गई थी। लेकिन रात 9 बजे उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इससे साफ हो गया कि इन 3 घंटों में ही ऐसा कुछ बड़ा हुआ जिससे ये नाराजगी इतनी बढ़ी की धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

सुप्रीम कोर्ट मामले में सरकार ने अकेला छोड़ा?

दरअसल अप्रैल माह में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों द्वारा भेजे गए विधेयकों पर हस्ताक्षर करने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए निर्धारित की गई समयसीमा को लेकर जवाब तलब किया था। साथ समय सीमा में विधेयकों को मंजूर करने की हिदायत भी दी थी। यह पहली बार था। जब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी देश के राष्ट्रपति को भी शामिल किया। जिसे लेकर भाजपा के कई सांसदों और उपराष्ट्रपति ने अलग-अलग टिप्पणी की थी।

इन टिप्पणियों पर जब सुप्रीम कोर्ट की अवमानना को लेकर याचिकाएं दाखिल होने लगीं तो भाजपा ने बयानों से खुद का अलग कर लिया। इनमें धनखड़ भी शामिल थे। पार्टी का यह कदम उनकी नाराजगी का कारण बना है। राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानते हैं कि धनखड़ के साथ पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ था जिसके चलते वो काफी आहत थे। धनखड़ सरकार के रुख से परेशान थे। उन्होंने अपनी नाराजगी भी कुछ लोगों से शेयर की थी। बाकी दो-चार दिनों में तस्वीर साफ हो जाएगी।

 

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