जोगिंद्रा को-ऑपरेटिव बैंक में “लूटतंत्र”, बैंक बना निजी जागीर

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बिना अनुमति वाहन खरीद, निजी विलासिता, रिकॉर्ड गायब

केंद्रीय एजेंसियों से जांच की मांग

एएम नाथ। सोलन : हिमाचल प्रदेश की प्रमुख सहकारी बैंक जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में आ गई है। बैंक के शीर्ष प्रबंधन पर सार्वजनिक धन के सुनियोजित दुरुपयोग, नियमों की खुली अवहेलना, वैधानिक अभिलेखों को जानबूझकर दबाने और नियामक तंत्र से मिलीभगत जैसे अत्यंत गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
इन आरोपों को लेकर मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय व हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय) ने नाबार्ड, मुंबई के मुख्य सतर्कता अधिकारी को एक विस्तृत और दस्तावेज़-आधारित शिकायत प्रस्तुत की है, जिसमें जोगिंद्रा बैंक के प्रबंध निदेशक पंकज सूद, वर्तमान अध्यक्ष तथा रजिस्ट्रार को-ऑपरेटिव सोसाइटी, शिमला कार्यालय की भूमिका को संदेह के घेरे में रखा गया है। यह स्थिति सीधे तौर पर यह दर्शाती है कि वाहन खरीद की पूरी प्रक्रिया अवैध, मनमानी और वित्तीय अनुशासन के विपरीत थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उक्त दोनों वाहन बैंकिंग कार्यों की बजाय प्रबंध निदेशक पंकज सूद एवं बैंक अध्यक्ष द्वारा निजी आवागमन, विलासिता, व्यक्तिगत सुविधा और पिक-एंड-ड्रॉप सेवाओं के लिए नियमित रूप से उपयोग किए जा रहे हैं।
विशेष रूप से यह आरोप अत्यंत गंभीर है कि प्रबंध निदेशक पंकज सूद प्रतिदिन परवाणू से सोलन (100 किलोमीटर से अधिक) की व्यक्तिगत यात्रा बैंक वाहन से कर रहे हैं, जिसका समस्त खर्च -ईंधन, चालक वेतन (आउटसोर्स चालक सहित), रख-रखाव, मरम्मत, बीमा एवं वाहन का अवमूल्यन-पूरी तरह बैंक अर्थात् जनता के धन से वहन किया जा रहा है।
मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब यह सामने आता है कि बैंक प्रबंधन ने आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत बार-बार मांगे जाने के बावजूद वाहनों की अनिवार्य लॉग बुक्स, मूवमेंट रजिस्टर, ईंधन बिल, चालक तैनाती विवरण उपलब्ध कराने से जानबूझकर इनकार किया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सबूतों को छिपाने, रिकॉर्ड में हेराफेरी और निजी यात्राओं को आधिकारिक दर्शाने का पूर्व नियोजित प्रयास है।
अधिवक्ता, मुकेश कुमार शर्मा शिकायत में यह भी उल्लेख है कि आरसीएस शिमला कार्यालय ने पहले फॉर्च्यूनर वाहन और बाद में इनोवा वाहन की खरीद को अस्वीकार किया था, इसके बावजूद वाहन खरीदे गए और कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे यह आशंका और प्रबल होती है कि नियामक अधिकारी भी इस पूरे मामले में मौन सहयोगी या मिलीभगत का हिस्सा रहे हैं।
शिकायत में बैंक के एक वर्तमान निदेशक की दिनांक 27.09.2025 की प्रस्तुति का हवाला देते हुए कहा गया है कि बैंक अध्यक्ष की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर की गई तथा उनके कार्यकाल में फर्नीचर और उपकरण बाजार मूल्य से कहीं अधिक दरों पर खरीदे गए, भवन उद्घाटन में लाखों रुपये फूल-मालाओं, भोज और सत्कार पर खर्च किए गए, बैंक संसाधनों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए उपयोग किया गया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि अवैध वाहन खरीद, निजी उपयोग, रिकॉर्ड की अनुपलब्धता, आरटीआई का उल्लंघन और नियामक चुप्पी। ये सभी तथ्य मिलकर आपराधिक विश्वासघात, सार्वजनिक धन के गबन, पद के दुरुपयोग और संगठित भ्रष्टाचार की ओर संकेत करते हैं।
अधिवक्ता, मुकेश कुमार शर्मा नाबार्ड से मांग की गई है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष सतर्कता जांच कराई जाए, लॉग बुक्स व संबंधित अभिलेखों को तत्काल जब्त किया जाए, फॉरेंसिक ऑडिट से वास्तविक वित्तीय नुकसान का आकलन हो तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय व आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
यह मामला केवल एक बैंक तक सीमित नहीं, बल्कि सहकारी संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक धन की सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा है। अब देखना यह है कि नाबार्ड और राज्य सतर्कता एजेंसियां इस गंभीर मामले में कितनी तत्परता और निष्पक्षता से कार्रवाई करती हैं।

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