जोगिंद्रा बैंक घोटाला आरटीआई से सच उजागर होने के डर से गुरमीत सिंह ने दबाए रिकॉर्ड

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एएम नाथ। सोलन : जोगिंदर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक, सोलन में सार्वजनिक धन से जुड़े कथित बहु-करोड़ रुपये के घोटालों को लेकर अब अत्यंत गंभीर और विस्फोटक आरोप सामने आए हैं। मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता, पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट चंडीगढ़ ने आरोप लगाया है कि गुरमीत सिंह ने बैंक प्रबंधन की मिलीभगत से तथा रजिस्ट्रार सहकारी समितियाँ, शिमला और नाबार्ड, शिमला के कुछ अधिकारियों के संरक्षण में वर्षों से चल रही वित्तीय अनियमितताओं को दबाने का संगठित प्रयास किया।

मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता के अनुसार, जब उन्होंने दिनांक 16 दिसंबर 2025 को सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विधिवत आरटीआई आवेदन दायर कर बैंक में दर्ज धोखाधड़ी प्रावधानों, लेखा-परीक्षा प्रतिवेदनों, बोर्ड बैठकों की कार्यवृत्तियों, दंडात्मक राशि के भुगतान तथा नाबार्ड को की गई रिपोर्टिंग का विवरण माँगा, तो यह तंत्र पूरी तरह बौखला गया। आरोप है कि सत्य सामने आने के भय से संबंधित अभिलेखों को जानबूझकर दबा दिया गया।
आरोप है कि गुरमीत सिंह ने लोक सूचना अधिकारी के रूप में अपने दायित्वों का खुला उल्लंघन करते हुए आरटीआई आवेदनों का दिनांक 19 जनवरी 2026 को मनमाना, अपूर्ण और भ्रामक उत्तर देकर सूचना देने से इनकार कर दिया। मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता का कहना है कि यह कोई साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि बैंक में दर्ज कथित धोखाधड़ी, करोड़ों रुपये के प्रावधान और नियामक उल्लंघनों को छिपाने की सोची-समझी साजिश है।
आरटीआई के माध्यम से विशेष रूप से भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा लगाए गए दंड, धोखाधड़ी के लिए किए गए वित्तीय प्रावधान, बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठकें, नोट-शीट्स, तथा नाबार्ड को की गई रिपोर्टिंग से संबंधित दस्तावेज़ माँगे गए थे, जिन्हें देने से कथित रूप से जानबूझकर बचा गया। मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता का आरोप है कि यदि ये सूचनाएँ सार्वजनिक हो जातीं, तो जोगिंदर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक में वर्षों से चल रही अनियमितताओं की परतें खुल जातीं।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि रजिस्ट्रार सहकारी समितियाँ, शिमला और नाबार्ड, शिमला को इन आरटीआई आवेदनों, शिकायतों और दस्तावेज़ों की जानकारी होने के बावजूद भी कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया गया। मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता का कहना है कि नियामक संस्थाओं की यह चुप्पी यह संकेत देती है कि पूरा तंत्र कथित रूप से एक-दूसरे को बचाने में लगा हुआ है।
मामले की गंभीरता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े अधिकारी अब भी अभिलेख-संवेदनशील पदों पर बनाए गए हैं। मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता ने इसे न्याय, पारदर्शिता और सार्वजनिक धन की सुरक्षा के साथ खुला मज़ाक बताया है।
मुकेश कुमार शर्मा, अधिवक्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आरटीआई के माध्यम से सूचना दबाना स्वयं में एक गंभीर अपराध है और यह सिद्ध करता है कि जोगिंदर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक का यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि पूरे सहकारी बैंकिंग तंत्र को खोखला करने वाला संगठित षड्यंत्र है। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, उच्च-स्तरीय तथा केंद्रीय जाँच एजेंसियों से निष्पक्ष जाँच कराई जाए, ताकि सार्वजनिक धन की कथित लूट और उसे बचाने वाले चेहरों को बेनकाब किया जा सके।

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