नई दिल्ली, 28 सितंबर। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए होने वाले बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। शीर्ष अदालत ने वित्त मंत्रालय की 14 और 15 सितंबर 2026 की राजपत्रित अधिसूचनाओं के क्रियान्वयन पर फिलहाल अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) तथा संबंधित यूपीआई कमेटी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सरकार से इस शुल्क व्यवस्था के कानूनी आधार और कार्यकारी अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करने को कहा है। मामला अंजन दत्ता बनाम भारत संघ से संबंधित है।
15 अक्टूबर से लागू होने का सरकार का दावा
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने अदालत को बताया कि नया शुल्क ढांचा 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा। सरकार के अनुसार यह कोई टैक्स या सरकारी शुल्क नहीं है और इससे प्राप्त राशि सरकारी खाते में नहीं जाएगी। इसे बैंकों और पेमेंट एग्रीगेटरों के बीच डिजिटल भुगतान व्यवस्था के संचालन से जुड़ा सेटलमेंट शुल्क बताया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ₹2,000 से अधिक के व्यावसायिक यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लगाने से डिजिटल भुगतान प्रभावित हो सकते हैं तथा व्यापारी अतिरिक्त लागत का भार उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। याचिकाकर्ता ने नकदी और काले धन के लेन-देन बढ़ने की आशंका भी जताई।
अदालत ने पूछा—कानूनी आधार क्या है?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने आयकर अधिनियम की धारा 269SU का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब कानून डिजिटल भुगतान की व्यवस्था को बढ़ावा देता है, तो इस तरह के शुल्क की कानूनी बाध्यता का आधार क्या है और सरकार के पास इसे लागू करने का कार्यकारी अधिकार किस प्रावधान से आता है।
अदालत ने केंद्र सरकार को हलफनामा दाखिल कर संबंधित तथ्यों और कानूनी आधार को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।
छोटे भुगतान और P2P लेन-देन पर शुल्क नहीं
सरकार की अधिसूचना के अनुसार सामान्य उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के अधिकांश यूपीआई लेन-देन इस व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे।
- P2P लेन-देन: व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई भुगतान पर राशि की कोई सीमा लगाए बिना शुल्क नहीं होगा।
- ₹2,000 तक के P2M भुगतान: मर्चेंट को किए जाने वाले ₹2,000 तक के भुगतान पर शून्य MDR रहेगा।
- छोटे व्यापारी: QR के जरिए प्रति माह ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को भी शुल्क से छूट दी गई है।
बड़े कारोबारी भुगतान पर MDR की दर
₹2,000 से अधिक के पात्र मर्चेंट लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत का मानक MDR प्रस्तावित है। ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन के लिए अधिकतम शुल्क ₹300 निर्धारित किया गया है।
कुछ विशेष क्षेत्रों के लिए अलग दरें रखी गई हैं। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे आवश्यक क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर अधिकतम ₹5 शुल्क निर्धारित किया गया है। वहीं पूंजी बाजार से जुड़े लेन-देन पर 0.02 प्रतिशत, अधिकतम ₹300 की दर लागू होगी।
उपभोक्ताओं से शुल्क वसूलने पर रोक
सरकार ने बैंकों और यूपीआई ऐप प्रदाताओं को निर्देश दिया है कि निर्धारित शुल्क को सीधे आम उपभोक्ताओं पर स्थानांतरित नहीं किया जाए। साथ ही यूपीआई ऐप प्रदाताओं द्वारा अलग से छिपा हुआ प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने पर भी रोक का प्रावधान किया गया है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचनाओं पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है। अब मामले में केंद्र सरकार के हलफनामे और आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि बड़े कारोबारी यूपीआई लेन-देन पर लागू किए जा रहे शुल्क की कानूनी वैधता पर अदालत का अंतिम रुख क्या रहता है।
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