एक पांव में जूता, दूसरे में नहीं, मगर दिल में सराज-मंडी की चिंता :

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दरकी ज़िंदगियाँ और रोती आँखों के बीच अगर कोई उम्मीद की तस्वीर दिखाई देती तो वो है मंडी के डीसी साहब अपूर्व देवगन

एएम नाथ। मंडी :  आपदा की मार से टूटी पहाड़ियाँ, दरकी ज़िंदगियाँ और रोती आँखों के बीच अगर कोई उम्मीद की तस्वीर दिखी है, तो वो है मंडी के उपायुक्त साहब अपूर्व देवगन जी। जिनके एक पांव में जूता था और दूसरे में नहीं।
उपायुक्त मंडी की वो तस्वीर जिसमें उनके एक पांव में जूता है और दूसरे में नहीं महज़ एक क्षण भर का दृश्य नहीं, बल्कि एक प्रतीक है उस सेवा भावना का जो आपदा की भयावहता के बीच भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटी। यह दृश्य बताता है कि जब पूरा क्षेत्र भूस्खलन, बाढ़ और तबाही से जूझ रहा था, तब एक प्रशासनिक अधिकारी जमीनी हालात को समझने, देखने और सुधारने के लिए खुद की सुविधा से ऊपर उठकर, कीचड़ और मलबे के बीच भी मौजूद था। जहां अधिकांश लोग ऐसे समय में एयरकंडीशंड ऑफिस से ही “निगरानी” करते हैं, वहीं मंडी के उपायुक्त ने यह साबित किया कि प्रशासनिक सेवा सिर्फ़ आदेश देने की नहीं, बल्कि नम आंखों और गीले पांवों के साथ जनता के बीच खड़े रहने की जिम्मेदारी है। पुनर्वास की प्रक्रिया में उनका नेतृत्व सिर्फ़ भाषणों तक सीमित नहीं रहा, उन्होंने मनरेगा जैसी योजनाओं को नए रूप में इस्तेमाल कर, गांव-गांव की टूटी हुई कनेक्टिविटी को फिर से जोड़ने की पहल की। यह सोच सिर्फ़ पुनर्निर्माण की नहीं, बल्कि स्थायी आजीविका और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की है। जब जनता अपने घर और खेत खो चुकी हो, तो उम्मीद की कोई भी किरण अमूल्य होती है और मंडी में वो किरण उपायुक्त की ईमानदार कोशिशों में दिख रही है। ऐसे समय में, जब राजनीति और दिखावे की होड़ तेज़ है, एक अफसर का नंगे पांव खड़ा होना यह सिखाता है कि असली नेतृत्व वही है, जो सिर्फ़ आदेश नहीं देता, बल्कि खुद आगे बढ़कर रास्ता बनाता है।

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