एएम नाथ। शिमला : हिमाचल प्रदेश में विकास के नाम पर बन रही सुरंगें आज प्रगति का प्रतीक नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भय और असुरक्षा का कारण बनती जा रही हैं। जिस सड़क, जिस सुरंग और जिस परियोजना को क्षेत्रीय विकास की रीढ़ बताया जा रहा था, वही आज लोगों के घरों में दरारें डाल रही है और परिवारों को सड़क पर लाने को मजबूर कर रही है।
ताजा मामला जिला शिमला के चलौंठी क्षेत्र का है जहां एक 6 मंजिला इमारत पर आए खतरे ने विकास के दावों की पोल खोल दी है। जिस टनल को यातायात सुगम करने के लिए बनाया जा रहा है, वही अब रिहायशी घरों के लिए काल साबित हो रही है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में 15 परिवारों को अपना आशियाना छोड़ खुले आसमान के नीचे रातें काटनी पड़ रही हैं।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल के कई हिस्सों—चाहे वह शिमला हो, मंडी, किन्नौर या कुल्लू में विकास परियोजनाओं की वजह से जमीन धंसने, मकानों के झुकने और पहाड़ों के कमजोर होने की खबरें सामने आती रही हैं। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब लोगों की छत छीन लेना है?
सुरंग निर्माण जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पहाड़ी राज्यों के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं। यहां की भू-गर्भीय संरचना नाजुक है, जहां एक छोटी सी लापरवाही भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। बावजूद इसके, कई परियोजनाओं में न तो समुचित भू-वैज्ञानिक अध्ययन किए जाते हैं और न ही स्थानीय लोगों की चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाता है। नतीजा यह होता है कि विस्फोट, खुदाई और भारी मशीनों के इस्तेमाल से जमीन की पकड़ कमजोर पड़ जाती है।
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घर नहीं, भरोसा टूटा है…
6 मंजिला मकान में आई दरारें सिर्फ ईंट-पत्थर का संकट नहीं हैं, यह उन परिवारों के भरोसे में आई दरारें हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की कमाई से अपना आशियाना बनाया था। आज वे परिवार सड़क पर हैं, अस्थायी ठिकानों में रहने को मजबूर हैं और भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा? मुआवजा कब और कितना मिलेगा? और क्या उनकी सुरक्षा की कोई ठोस गारंटी है?
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प्रशासन और सरकार की जवाबदेही…
ऐसे मामलों में अक्सर प्रशासन शुरुआती जांच के आदेश देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन जांच रिपोर्ट आने तक पीड़ित परिवारों का क्या? क्या उन्हें तुरंत राहत, वैकल्पिक आवास और आर्थिक सहायता मिल रही है? विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले और निर्माण के दौरान सख्त निगरानी व्यवस्था क्यों नहीं होती?
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जरूरत संतुलित विकास की…
हिमाचल को सड़कें, सुरंगें और आधुनिक सुविधाएं चाहिए, लेकिन ऐसे विकास की नहीं जो पहाड़ों की आत्मा और लोगों की जिंदगी को कुचल दे। जरूरी है कि हर परियोजना में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाए, पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन हो और स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
हिमाचल में विकास की यह ‘सुरंग’ अगर इसी तरह आगे बढ़ती रही, तो रोशनी की जगह अंधेरा ही हाथ लगेगा। सरकार और प्रशासन को समझना होगा कि असली विकास वही है जो लोगों को सुरक्षित रखे, न कि उन्हें बेघर कर दे। 15 परिवारों का सड़क पर आ जाना व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। अब भी वक्त है कि विकास और मानवता के बीच संतुलन बनाया जाए, वरना पहाड़ खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाएंगे।
