120 दिनों के अंदर ‘हां या ना’…..राजनीतिक नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का फैसला 120 दिनों में लेना अनिवार्य …अधिसूचना जारी

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चंडीगढ़। सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों व राजनेताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए 120 दिनों के अंदर ‘हां या ना’ में फैसला लेने का प्रावधान अधिसूचित कर दिया गया है।

राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया की ओर से शुक्रवार को जारी अधिसूचना के अनुसार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, (बीएनएसएस) की धारा 218 की उपधारा (1) में प्राप्त शक्तियों व इस संबंध में उन्हें सक्षम बनाने वाली अन्य सभी शक्तियों का प्रयोग करते हुए राज्यपाल को यह सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि सरकार को अभियोजन मंजूरी के लिए प्राप्त अनुरोध पर 120 दिनों के भीतर निर्णय लेना होगा।

यदि 120 दिनों के भीतर कोई निर्णय नहीं सुनाया जाता है तो उसे सरकार की मंजूरी मान ली जाएगी। अभी तक सरकार अभियोजन मंजूर देने में काफी समय लगा देती थी।

बता दें कि पंजाब सरकार ने 24 सितंबर को भ्रष्टाचार के मामले में फंसे पूर्व कैबिनेट मंत्री साधु सिंह धर्मसोत के खिलाफ केस चलाने की अनुमति दी थी। इसी प्रकार आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल में बंद पूर्वमंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ आठ सितंबर को कैबिनेट ने केस चलाने की मंजूरी दी थी जबकि कई मामलों में सरकार वर्षों तक केस चलाने की मंजूरी ही नहीं दे रही थी।

भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर ही यह देखने को मिलता था कि सरकार केस चलाने को मंजूरी नहीं देती है। राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद सबसे पहला भ्रष्टाचार का मामला पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डा. विजय सिंगला का आया था। उन्हें कैबिनेट से बर्खास्त तो कर दिया गया लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी गई।

नियमों के अनुसार, राज्य सरकार को पूर्व मंत्रियों की जांच के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत स्वीकृति प्रदान करनी होती है। बीएनएसएस में किए गए प्रावधानों में किसी राजनेता या न्यायिक अधिकारी/मजिस्ट्रेट के खिलाफ कथित अपराध के लिए कार्यवाही की जा सकती है, यदि स्वीकृति प्रदान करने वाला प्राधिकारी (केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मामले में केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों के मामले में राज्य) 120 दिनों के भीतर स्वीकृति पर निर्णय लेने में विफल रहता है क्योंकि उसे स्वीकृति मान लिया जाएगा

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