वरिष्ठ अधिकारियों को बिना भूमिका तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग…..NDPS मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

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चंडीगढ़ :  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने जिला अदालतों द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बिना ठोस आधार के बचाव पक्ष के गवाह के रूप में तलब किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर तीखी आपत्ति जताई।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन अधिकारियों की किसी मामले की जांच में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है, उन्हें केवल “ध्यान आकर्षित करने” या “मुकदमे को लटकाने” के उद्देश्य से तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है।

यह टिप्पणी जालंधर की एक अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें लुधियाना के पुलिस आयुक्त स्वपन शर्मा को एनडीपीएस मामले में गवाह के रूप में तलब किया गया था। हाई कोर्ट के जस्टि जसजीत सिंह बेदी की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील और जालंधर की अदालत दोनों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि ऐसे आदेश न केवल कार्यवाही में बाधा डालते हैं, बल्कि समयबद्ध एनडीपीएस मामलों को जानबूझकर लंबा खींचने का माध्यम भी बनते हैं।

खुली अदालत में पीठ ने पूछा- “आपको लुधियाना के पुलिस आयुक्त को अदालत में बुलाने की क्या आवश्यकता है? क्या सिर्फ सीसीटीवी रिकार्ड देने के लिए?”

जमानती वारंट जारी करने पर गंभीर आश्चर्य जताया

कोर्ट ने वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करने के लिए जमानती वारंट जारी करने पर भी गंभीर आश्चर्य जताया। जब बचाव पक्ष कोई संतोषजनक आधार प्रस्तुत नहीं कर सका, तो पीठ ने कहा कि ईमानदार और गैर-जांचकर्ता अधिकारियों को केवल मीडिया सुर्खियों या देरी की रणनीति के लिए कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब पुलिस आयुक्त की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति का औपचारिक अनुरोध किया गया था, तब जिला अदालत को उस पर विचार करना चाहिए था। शारीरिक उपस्थिति पर जाेर देना विशेष कर तब, जब अधिकारी किसी उच्च जोखिम जांच में वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हों, न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

पीठ ने समन आदेश के बाद हुई मीडिया रिपोर्टिंग पर भी चिंता जताई और कहा कि अटकलबाज़ी तथा गलत जानकारी से प्रेरित कवरेज वरिष्ठ अधिकारियों की छवि को क्षति पहुंचाती है। न्यायालय ने माना कि ऐसी रिपोर्टिंग से पत्रकारिता की पारदर्शिता और जनविश्वास दोनों प्रभावित होते हैं।इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने जालंधर अदालत के समन आदेश पर तत्काल रोक लगा दी।

2024 की रिकवरी से जुड़ा है मामला

अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां जांच पूरी हो चुकी हो, बरामदगी और गिरफ्तारी के ठोस साक्ष्य हों, वहां वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करने से न्याय में देरी के अलावा कोई उद्देश्य सिद्ध नहीं होता। यह एनडीपीएस केस जालंधर कमिश्नरेट पुलिस के एक सुव्यवस्थित, दो माह लंबे अभियान से जुड़ा है। मार्च 2024 में अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ, जो कूरियर चैनलों के माध्यम से ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक फैला था।

इस आपरेशन में नौ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, 22 किलो अफीम बरामद की गई जिसमें 17 किलो सीधे आरोपियों से जुड़ी थी। झारखंड से अभी राम की गिरफ्तारी हुई, जिसके पास से 12 किलो अफीम मिली। कूरियर, हवाला संचालकों और बिचौलियों की संलिप्तता उजागर हुई। 9 करोड़ रुपये से जुड़े 30 बैंक खाते फ्रीज किए गए।

छह सीमा शुल्क अधिकारियों से जुड़े गहरे नेटवर्क का भी पर्दाफाश हुआ, जिनमें दिल्ली के चार कर्मचारी गिरफ्तार किए गए।हाई कोर्ट ने माना कि पूरी सप्लाई चेन ध्वस्त हो चुकी है, इसलिए ऐसे मामले में वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करना न्यायिक देरी के सिवा कुछ नहीं।

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