‘शिक्षक पढ़ाएं या जनगणना करें?’ सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था पर चिंता
एएम नाथ। चंबा : हिमाचल प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों पर लगातार बढ़ रहे गैर-शैक्षणिक कार्यों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। चुनावी ड्यूटी, विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अब जनगणना कार्यों में शिक्षकों की तैनाती के कारण विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। विशेषकर चंबा जैसे दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों वाले जिले में अध्यापकों से विद्यालय समय के बाद जनगणना कार्य करवाने के निर्णय पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
जिले के कई विद्यालय ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां पहुंचने के लिए शिक्षकों को घंटों पैदल सफर करना पड़ता है। खराब सड़कें, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते और आगामी बरसात का मौसम उनकी कठिनाइयों को और बढ़ा सकता है। ऐसे में पूरे दिन अध्यापन कार्य करने के बाद अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाना शिक्षकों के लिए चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
शिक्षकों का कहना है कि वे केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य निर्माता हैं। यदि उनका अधिकांश समय और ऊर्जा गैर-शैक्षणिक कार्यों में खर्च होगी तो इसका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों की पढ़ाई, शैक्षणिक उपलब्धियों और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा। लगातार अतिरिक्त कार्यों से शिक्षकों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि जनगणना राष्ट्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन शिक्षा भी देश के भविष्य की नींव है। इसलिए दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उनका सुझाव है कि जनगणना कार्य के लिए बेरोजगार शिक्षित युवाओं, आउटसोर्स कर्मियों अथवा विशेष रूप से नियुक्त गणनाकारों की सेवाएं ली जा सकती हैं। इससे युवाओं को रोजगार और अनुभव मिलेगा, जबकि विद्यालयों में शैक्षणिक गतिविधियां भी बिना बाधा जारी रह सकेंगी।
शिक्षकों और शिक्षा प्रेमियों ने सरकार से मांग की है कि विद्यालयों में शिक्षण कार्य को प्राथमिकता दी जाए तथा शिक्षकों को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक दायित्वों से राहत प्रदान की जाए। उनका कहना है कि यदि शिक्षक पूरी ऊर्जा और समर्पण के साथ कक्षाओं में उपस्थित रहेंगे, तभी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी और राज्य का शैक्षिक स्तर मजबूत होगा।