वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक सहभागिता से मिलेंगे पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान: हेमराज बैरवा

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हिमालयी जल, जलवायु एवं आपदा प्रबंधन पर एक माह का राष्ट्रीय प्रशिक्षण एवं इंटर्नशिप कार्यक्रम हिम-केयर प्लस शुरू
एएम नाथ। धर्मशाला, 25 जून: हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, जल सुरक्षा और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रति युवाओं को जागरूक एवं प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से एच.एन.बी. गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (उत्तराखंड) के भूगोल विभाग तथा इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर वूमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ हिमालयन रिसर्च के संयुक्त तत्वावधान में एक माह का राष्ट्रीय प्रशिक्षण एवं इंटर्नशिप कार्यक्रम हिम-केयऱ प्लस (हिमालयन क्लाईमेट एडाप्शन एंड रेसिलिएंस एजुकेशन) आयोजित किया जा रहा है, यह कार्यक्रम 22 जुलाई, 2026 तक चलेगा।
इस संबंध में उपायुक्त कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा ने कहा कि जटिल समस्याओं के समाधान के लिए ज्ञान, अनुभव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का साझा आदान-प्रदान अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और समुदायों के सहयोग से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के संवाद और विचार-विमर्श से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, सामुदायिक सशक्तिकरण तथा जलवायु अनुकूल विकास की दिशा में नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी।
कार्यक्रम के निदेशक प्रोफेसर एम.एस. पंवर ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में जल स्रोतों की उपलब्धता वहां की भू-वैज्ञानिक संरचना और चट्टानों के प्रकार पर निर्भर करती है। उन्होंने क्षेत्र में वैज्ञानिक जल प्रबंधन और स्प्रिंगशेड प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि झरनों के रिचार्ज क्षेत्रों की पहचान कर जल स्रोतों का संरक्षण प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। उन्होंने प्रतिभागियों से क्षेत्रीय भ्रमण के दौरान हाइड्रोजियोलॉजिकल संरचनाओं, दरारों और भ्रंशों का गहन अध्ययन करने का आह्वान किया।
इस अवसर पर सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के प्रोफेसर बी.डब्ल्यू. पांडे ने कहा कि हिमालय को समझने के लिए केवल पुस्तकों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके भूगोल, पर्यावरण और समाज को नजदीक से जानना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हिमालय विश्व का अत्यंत संवेदनशील और नाजुक पारिस्थितिक तंत्र है, जो जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और बढ़ती गर्मी हिमालय के लिए बड़ा खतरा है, क्योंकि हिमालयी ग्लेशियर करोड़ों लोगों के लिए जल का प्रमुख स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि यदि हिमालय को संरक्षित रखना है तो इसके प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और संवेदनशील उपयोग करना होगा तथा प्रत्येक व्यक्ति को इसके संरक्षण के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
इस अवसर पर प्रोफेसर वी.के. पुरोहित ने कहा कि कांगड़ा सहित हिमालयी क्षेत्रों में जल स्रोतों के समक्ष बढ़ती चुनौतियां मुख्यतः मानवजनित गतिविधियों का परिणाम हैं। उन्होंने जल संसाधनों, वनों और पौधों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ओक और रोडोडेंड्रॉन जैसी चैड़ी पत्ती वाली प्रजातियां जल संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कार्यक्रम के सह-निदेशक डॉ. गौरव एवं अन्य विषय विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम युवाओं में वैज्ञानिक सोच, नेतृत्व क्षमता और सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिभागियों को जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, स्प्रिंगशेड प्रबंधन, जल सुरक्षा, जल गुणवत्ता मूल्यांकन, जीआईएस एवं जीपीएस आधारित मानचित्रण, मौसम विज्ञान, आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा ग्राम स्तरीय जलवायु कार्य योजना से संबंधित व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के चयनित क्षेत्रों में फील्ड विजिट और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से जमीनी अनुभव भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इस अवसर पर प्रोफेसर पूनम कुमारी, प्रोफेसर एस.पी. सिंह, कार्यक्रम समन्वयक डॉ. आकाश उपाध्याय, डॉ. ज्योति, डॉ. राजन मौर्य तथा डॉ. सिद्धार्थ भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
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