बिट्टू की एंट्री से बदली पंजाब की चुनावी बिसात : भाजपा नया समीकरण गढ़ने में कामयाब

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चंडीगढ़ : केंद्रीय मंत्री पद से रवनीत सिंह बिट्टू का इस्तीफा पंजाब की राजनीति में भाजपा के सबसे बड़े चुनावी दांव के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि बिट्टू विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं और पार्टी के चुनाव अभियान का प्रमुख चेहरा भी बन सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि रवनीत सिंह बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो चुका था। इसके बाद उन्होंने रेल तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया। बिट्टू ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए कहा कि उन्हें देश और विशेष रूप से पंजाब की सेवा करने का अवसर मिला तथा उनका सार्वजनिक जीवन राष्ट्रवाद, सेवा और विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे भी जारी रहेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पौत्र बिट्टू लंबे समय तक कांग्रेस में रहे। वर्ष 2009 में वह आनंदपुर साहिब से सांसद बने और बाद में दो बार लुधियाना का प्रतिनिधित्व किया। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा का दामन थामा, लेकिन लुधियाना से कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खिलाफ चुनाव हार गए। इसके बाद उन्हें राजस्थान से राज्यसभा भेजा गया और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।

पंजाब की राजनीति में बिट्टू की वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वह पिछले कुछ समय से पंजाब में भाजपा के संगठन और चुनावी तैयारी में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने पहले ही सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि भाजपा का लक्ष्य पंजाब में “डबल इंजन सरकार” बनाना है और प्रधानमंत्री मोदी के विकास के विजन को हर विधानसभा क्षेत्र तक पहुंचाना है।

दरअसल, बिट्टू की वापसी भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत पार्टी पंजाब में अपने पारंपरिक शहरी हिंदू वोट बैंक से आगे बढ़कर सिख, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच भी मजबूत आधार तैयार करना चाहती है। पंजाब में लगभग 58 प्रतिशत आबादी सिखों की है, जबकि करीब 39 प्रतिशत हिंदू हैं। इसके अलावा राज्य में लगभग 32 प्रतिशत दलित और लगभग 16 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग है। भाजपा की कोशिश इन चारों सामाजिक वर्गों में समानांतर स्वीकार्यता बढ़ाने की है।

भाजपा की इसी नई रणनीति की झलक हाल में आई ‘सतलुज’ फिल्म को लेकर हुए विवाद में भी देखने को मिली थी। रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म का खुलकर विरोध करते हुए आरोप लगाया कि यह ऐसे संवेदनशील विषय को उभारने का प्रयास है, जिससे पंजाब का माहौल दोबारा तनावपूर्ण हो सकता है। उन्होंने इसे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली कोशिश बताते हुए फिल्म पर सवाल उठाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिट्टू का यह रुख भाजपा की बदली हुई चुनावी रणनीति का संकेत था। पहले जहां पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर अपेक्षाकृत आक्रामक भाषा का प्रयोग करती थी, वहीं अब वह सिख समुदाय की धार्मिक और ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति को अधिक संतुलित और संयमित बना रही है। माना जा रहा है कि भाजपा पंजाब में सिख मतदाताओं के बीच भरोसा बढ़ाने के लिए ऐसे मुद्दों पर सावधानीपूर्वक राजनीतिक संदेश देना चाहती है, ताकि हिंदू, सिख, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग, इन चारों प्रमुख सामाजिक समूहों में समानांतर स्वीकार्यता विकसित की जा सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनने की दिशा में लगातार काम किया है। इसका असर चुनावी आंकड़ों में भी दिखा, जहां 2022 विधानसभा चुनाव में लगभग 6.6 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा का वोट प्रतिशत 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर लगभग 19 प्रतिशत तक पहुंच गया। यही कारण है कि पार्टी अब पंजाब में अकेले दम पर सत्ता हासिल करने का सपना देख रही है।

हालांकि शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा के रिश्तों को लेकर राजनीतिक अटकलें अब भी खत्म नहीं हुई हैं। इसका ताजा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा के दौरान देखने को मिला था। जालंधर की सभा में प्रधानमंत्री ने आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और ‘अकाली दल’ तीनों पर निशाना साधते हुए कहा कि अकाली दल भी आपसी स्वार्थों के कारण पंजाब की प्रभावी सेवा नहीं कर पाया। प्रधानमंत्री ने किसी विशेष अकाली गुट का नाम नहीं लिया, लेकिन शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने बाद में दावा किया कि यह टिप्पणी उनकी पार्टी पर नहीं, बल्कि अन्य अकाली धड़ों के लिए थी। इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी, क्योंकि भाजपा और अकाली दल का लगभग 25 वर्षों पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूटने के बाद भी दोनों दलों के हर सार्वजनिक बयान को संभावित राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि भाजपा नेतृत्व फिलहाल गठबंधन पुनर्जीवित करने की किसी संभावना से इंकार कर रहा है और अपने संगठन को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने की बात कह रहा है, फिर भी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की राजनीति में भाजपा और अकाली दल के संबंध इतने महत्वपूर्ण रहे हैं कि दोनों दलों के बीच होने वाला हर संवाद भविष्य की संभावनाओं के नजरिए से परखा जाता है।

साथ ही भाजपा ने अपने राजनीतिक संदेश और भाषा में भी उल्लेखनीय बदलाव किया है। कभी ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर बेहद आक्रामक रुख अपनाने वाली पार्टी अब सिख समाज की धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक शिकायतों को अधिक संवेदनशीलता से संबोधित करती दिखाई दे रही है। पार्टी लगातार कांग्रेस को ऑपरेशन ब्लू स्टार, पंजाब में आतंकवाद के दौर और 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराती है, जबकि स्वयं को सिख समाज की भावनाओं का सम्मान करने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है।

देखा जाये तो भाजपा की इस बदली हुई राजनीतिक रणनीति की पृष्ठभूमि को समझने के लिए उसके पुराने रुख पर भी नजर डालना जरूरी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘माय कंट्री, माय लाइफ’ में पंजाब में उग्रवाद के दौर के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों के लिए उग्रवाद को बढ़ावा दिया और हालात इतने बिगड़ने दिए कि अंततः ऑपरेशन ब्लू स्टार की नौबत आ गई। आडवाणी ने यह भी लिखा था कि भाजपा और अन्य दलों के देशव्यापी आंदोलनों के दबाव में तत्कालीन केंद्र सरकार को स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को हटाने के लिए सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी थी। हालांकि अब पंजाब में चुनावी विस्तार की कोशिशों के बीच भाजपा की सार्वजनिक भाषा पहले की तुलना में कहीं अधिक संतुलित और संवेदनशील दिखाई देती है। पार्टी अब ऑपरेशन ब्लू स्टार को ‘राष्ट्रीय त्रासदी’ बताते हुए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराती है, लेकिन साथ ही सिख समाज की धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक पीड़ा को भी प्रमुखता से स्वीकार करने का प्रयास कर रही है।

इसी बदलाव के तहत भाजपा ने हाल के वर्षों में कई प्रतीकात्मक और राजनीतिक कदम उठाए हैं। वीर बाल दिवस की घोषणा, करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन, अफगानिस्तान से गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप भारत लाना, 1984 दंगों के मामलों की जांच में तेजी, हवाई अड्डों पर कृपाण ले जाने की अनुमति, स्वर्ण मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लगातार दौरे तथा लंबे समय से जेल में बंद कुछ सिख कैदियों को मानवीय आधार पर राहत जैसे फैसलों को इसी व्यापक सिख पहुंच अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा ने यह भी संकेत दिया है कि सत्ता में आने पर धर्मांतरण विरोधी कानून लाया जा सकता है।

हालांकि भाजपा इस पूरे अभियान के दौरान एक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है। पार्टी स्पष्ट करती है कि उसका आतंकवाद और खालिस्तानी हिंसा के प्रति रुख नहीं बदला है। पंजाब भाजपा के नेताओं का कहना है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार को राष्ट्रीय त्रासदी मानने का अर्थ आतंकवाद का समर्थन नहीं है, बल्कि उस समय की परिस्थितियों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराना है।

फिर भी भाजपा की इस नई राजनीतिक भाषा को लेकर संदेह भी कम नहीं है। कई राजनीतिक विश्लेषकों और सिख बुद्धिजीवियों का मानना है कि पार्टी का यह बदलाव मुख्य रूप से चुनावी गणित से प्रेरित है। उनका कहना है कि केवल हिंदू मतों के सहारे पंजाब में सरकार बनाना संभव नहीं है, इसलिए भाजपा सिख मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अपने राजनीतिक संदेश को नया स्वरूप दे रही है।

बहरहाल, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा की सामाजिक समीकरणों पर आधारित नई रणनीति और सिख समाज तक पहुंच बनाने की कोशिश पंजाब के मतदाताओं को प्रभावित कर पाएगी या फिर राज्य की पारंपरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति ही चुनाव परिणाम तय करेगी। अगले विधानसभा चुनाव इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब साबित होंगे।

 

 

 

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