F-16, B1, B2, सब बेअसर…ईरान ने तोड़ दी यूएस एयरफोर्स की रीढ़! जानें जंग में अमेरिका को अब तक कितना नुकसान

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ईरान के खिलाफ जंग छेड़कर अमेरिका अपने ही हाथ जला बैठा है. पश्चिम एशिया में बीते 15 दिनों से जारी इस महायुद्ध यानी ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने अब एक नया खतरनाक मोड़ ले लिया है. डोनाल्ड ट्रंप ने जब ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खामेनेई को मारने के लिए इस ऑपरेशन को जब मंजूरी दी थी तो शायद सोचा नहीं होगा कि यह जंग इतनी लंब खिंचेगी और उसे इतना नुकसान उठाना पड़ेगा।

इस महाजंग में ईरान घायल शेर की तरह लड़ता दिख रहा है और इजरायल पर ताबड़तोड़ हमलों के साथ-साथ खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन बरसा रहा है. इसी कड़ी में ईरान ने आज सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर हमला बोलकर अमेरिकी वायुसेना के 5 KC-135 रिफ्यूलिंग प्लेन को ज़मीन पर खड़े-खड़े क्षतिग्रस्त कर दिया. ये टैंकर हाल के दिनों में हुए मिसाइल हमले का शिकार बने. हालांकि अमेरिका का दावा है कि इस हमले में प्लेन पूरी तरह तबाह नहीं हुए और मरम्मत के लिए भेज दिए गए हैं. हमले में कोई मौत या घायल नहीं हुआ, लेकिन यह ईरान की क्षमता का बड़ा प्रदर्शन है।

इससे एक दिन पहले ही इराक के पश्चिमी इलाके में एक और KC-135 रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट क्रैश हो गया था, जिसमें सवार सभी 6 क्रू मेंबर्स की मौत हो गई. यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इसकी पुष्टि की है. ये दोनों घटनाएं युद्ध के महज 15 दिनों में अमेरिका को लगातार तीसरा बड़ा झटका हैं।

अमेरिका के कितने विमान तबाह

ईरान के हमले ने अमेरिकी एयर फोर्स की रीढ़ कही जाने वाली रिफ्यूलिंग क्षमता को सीधा निशाना बनाया है. प्रिंस सुल्तान बेस पर क्षतिग्रस्त 5 केसी-135 स्ट्रैटोटैंकर अमेरिकी ऑपरेशंस के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे. ये प्लेन एफ-15, एफ-16 और बी-52 जैसे लड़ाकू विमानों को हवा में ईंधन भरते हैं. इनके डैमेज से अमेरिका की एयर कैंपेन प्रभावित हुई है।

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने बताया कि प्लेन मरम्मत योग्य हैं, लेकिन रिफ्यूलिंग मिशनों में देरी हो रही है. इराक क्रैश में खोया एक और KC-135 चौथा सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया गया एयरक्राफ्ट लॉस है. इससे पहले कुवैत में अमेरिकी एयरबेस के पास भी एक बड़ा हमला हुआ था. रिपोर्टों के अनुसार एयरबेस के आसपास संदिग्ध मिसाइल या ड्रोन गतिविधि देखी गई, जिसके बाद सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिया गया. इस हमले में तीन अमेरिकी फाइटर जेट क्रैश हो गए. हालांकि कुवैत और अमेरिका ने इसे ईरानी अटैक नहीं, बल्कि फ्रेंडली फायर का नतीजा बताया था।।

कितने अमेरिकी सैनिकों की हुई मौत

ईरान के खिलाफ शुरू हुए इस युद्ध में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है, खासकर मानवीय और सैन्य स्तर पर. 28 फरवरी से शुरू हुई इस लड़ाई में अमेरिकी सेनाओं पर ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों से सैनिकों की मौतें बढ़ती जा रही हैं. ईरानी युद्ध के दौरान अब तक कम से कम 13 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं,ल। जबकि 140 से 150 सैनिक घायल हुए हैं।

13 मौतें छोटी संख्या लग सकती हैं, लेकिन हर मौत एक परिवार को तोड़ रही है. इराक क्रैश के 6 शहीदों में से ज्यादातर युवा एयरमैन थे. उनके शव डोवर एयर फोर्स बेस पहुंच चुके हैं, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने श्रद्धांजलि दी. ट्रंप ने एक्स पर लिखा, ‘हमारे बहादुर सैनिकों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी. ईरान को इसका जवाब मिलेगा.’ वहीं घायलों में 150 सैनिकों का आंकड़ा भी चिंताजनक है. पेंटागन ने कहा कि 8 गंभीर घायल सैनिक जर्मनी के लैंडस्टुल मेडिकल सेंटर में भर्ती हैं।

यह नुकसान सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है. रिफ्यूलिंग प्लेन का डैमेज अमेरिकी एयर ऑपरेशंस को कमजोर कर रहा है. ईरान के IRGC प्रवक्ता अली मोहम्मद नेईनी ने दावा किया कि ‘हमारी नई मिसाइलें अभी इस्तेमाल नहीं हुईं. हम 6 महीने की जंग के लिए तैयार हैं.’ वहीं, अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने NBC को बताया कि रूस ईरान को खुफिया मदद दे रहा है, जिससे हमले और सटीक हो रहे हैं।

ईरानी ड्रोन के आगे अमेरिका बेबस!

यह नुकसान 1991 के गल्फ वॉर या 2003 के इराक युद्ध से अलग है. तब अमेरिका ने हवाई श्रेष्ठता हासिल की थी, लेकिन आज ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन अमेरिकी बेस तक पहुंच रहे हैं. विश्लेषक कहते हैं कि ईरान ने ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ अपनाया है, जिसमें सस्ते ड्रोनों से महंगे अमेरिकी एसेट्स को निशाना बना रहा है. पेंटागन का कहना है कि ईरानी हमले से बेहद ‘सीमित’ नुकसान हुआ है और अमेरिका की सैन्य क्षमता बरकरार है. हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ईरान अपनी नई मिसाइलें (2015-2025 में बनी) इस्तेमाल करेगा तो नुकसान और बढ़ेगा. इसे लेकर सऊदी अरब से लेकर खाड़ी के सभी देश अब हाई अलर्ट पर हैं।

अमेरिकी खजानों पर भारी पड़ रही जंग

पेंटागन के आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका ने 11 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर दिया है. इसमें मिसाइल डिफेंस (थाड, पैट्रियट), एयर स्ट्राइक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर रिपेयर शामिल हैं. अगर युद्ध एक महीने और चला तो लागत 210 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है, जैसा कि पेन व्हार्टन बजट मॉडल के निदेशक केंट स्मेटर्स ने अनुमान लगाया है।

इस युद्ध के चलते शुरू हुए तेल संकट की वजह से दुनियाभर की अर्थव्यवस्था पर बोझ भी बढ़ रहा है. तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल पार कर गई हैं. बीमा कंपनियां शिपिंग रूट्स पर प्रीमियम बढ़ा रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका को अपने ठिकानों की सुरक्षा के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयास भी तेज करने होंगे, क्योंकि लंबे समय तक सैन्य टकराव क्षेत्र को और अस्थिर कर सकता है. कुवैत से लेकर इराक और सऊदी अरब तक अमेरिकी ठिकानों पर हुए हमलों ने यह साफ कर दिया है कि क्षेत्र में सुरक्षा हालात तेजी से बदल रहे हैं. फाइटर जेट से लेकर नौसैनिक बेड़ों तक को निशाना बनाए जाने की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि संघर्ष अब पारंपरिक युद्ध से आगे बढ़कर नई तकनीकों और रणनीतियों के दौर में प्रवेश कर चुका है।

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