JCCB में कथित ऋण अनियमितताओं पर नाबार्ड से स्वतंत्र जांच की मांग

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2017 की जांच में तीनों आरोप सिद्ध होने का दावा, कार्रवाई नहीं होने पर उठाए सवाल

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने परिवार को दिए ऋण और प्रतिभूति की वैधता पर भी उठाए सवाल

एएम नाथ। सोलन : जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (JCCB) में कथित ऋण अनियमितताओं को लेकर बैंक प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर फिर सवाल उठे हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने 5 सितंबर 2026 को नाबार्ड के मुख्य सतर्कता अधिकारी को शिकायत भेजकर तत्कालीन सेवरा चंडी शाखा प्रबंधक राम पाल के कार्यकाल में स्वीकृत ऋणों की स्वतंत्र जांच की मांग की है। शिकायत में वर्ष 2017 में हुई जांच के बावजूद कथित तौर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं किए जाने की भी जांच की मांग उठाई गई है।
शिकायतकर्ता ने 26 सितंबर 2017 की जांच रिपोर्ट को मामले का अहम आधार बताया है। शिकायत में उद्धृत रिपोर्ट के अनुसार जांच अधिकारी कुलदीप सिंह ने राम पाल के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोप सिद्ध पाए थे। रिपोर्ट में एक ही परिवार के सदस्यों को बार-बार ऋण देने, अलग-अलग शाखाओं से ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने, ऋण लेने वालों की पात्रता और भुगतान क्षमता का पर्याप्त आकलन नहीं करने तथा पर्याप्त सुरक्षा नहीं लेने जैसी कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। जांच अधिकारी ने इन कृत्यों से बैंक की निधियों को गंभीर जोखिम में डाले जाने की बात कही थी।
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कार्रवाई पर उठे सवाल

शिकायतकर्ता का आरोप है कि उक्त जांच के बावजूद राम पाल के खिलाफ प्रभावी विभागीय कार्रवाई नहीं हुई। इसके विपरीत, उन्हें बाद में पदोन्नतियां और वित्तीय लाभ मिलते रहे। शिकायत के अनुसार राम पाल वर्तमान में JCCB के प्रधान कार्यालय, सोलन में AGM के पद पर कार्यरत हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और शिकायत में लगाए गए आरोपों की सत्यता जांच का विषय है।
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परिवार को ऋण देने का मामला
शिकायत में जय राम और उनके परिवार को स्वीकृत ऋणों का भी उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि जय राम को वर्ष 2009 से 2011 के बीच विभिन्न योजनाओं के तहत करीब 22.10 लाख रुपये के ऋण दिए गए। उनकी पत्नी सीमा देवी को भी करीब 11.98 लाख रुपये की ऋण सुविधाएं दिए जाने का उल्लेख है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि पूर्व ऋणों और कथित डिफॉल्ट की स्थिति के बावजूद नई ऋण सुविधाएं मंजूर की गईं।
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प्रतिभूति की वैधता पर सवाल
13 लाख रुपये के ट्रक ऋण के मामले में करीब 45.10 लाख रुपये मूल्य की बताई गई भूमि को सुरक्षा के रूप में दर्शाने का उल्लेख है, लेकिन आरोप है कि यह भूमि बैंक के पक्ष में विधिवत बंधक नहीं थी। इसी तरह 4.50 लाख रुपये के दूध गंगा ऋण में करीब 48.47 लाख रुपये मूल्य की बताई गई भूमि की कानूनी सुरक्षा पर भी सवाल उठाया गया है।
शर्मा के अनुसार संबंधित परिवार के सात ऋण खाते NPA हो चुके हैं। उन्होंने मूल ऋण फाइलों, टाइटल दस्तावेजों, मॉर्गेज डीड, संपत्ति मूल्यांकन, कानूनी राय, ऋण वितरण और फंड-फ्लो की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
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200 से अधिक ऋणों की जांच की मांग
शिकायत में राम पाल के कार्यकाल में स्वीकृत 200 से अधिक अन्य ऋण मामलों की भी जांच की आवश्यकता जताई गई है। साथ ही 2017 की जांच के बाद कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों की भूमिका और बैंक को हुए संभावित वित्तीय नुकसान का आकलन करने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने 15 दिनों में कार्रवाई नहीं होने पर कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखा है।
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शिकायत में क्या आरोप

1. 2017 की जांच में तत्कालीन शाखा प्रबंधक के खिलाफ तीनों आरोप सिद्ध होने का दावा।
2. एक ही परिवार के सदस्यों को बार-बार ऋण और अलग-अलग शाखाओं से ऋण सुविधाएं देने का आरोप।
3. ऋण लेने वालों की भुगतान क्षमता और पात्रता के पर्याप्त आकलन पर सवाल।
4. पर्याप्त कानूनी सुरक्षा लिए बिना ऋण स्वीकृत किए जाने का आरोप।
5. संबंधित परिवार के सात ऋण खाते NPA होने का शिकायतकर्ता का दावा।
6. राम पाल के कार्यकाल में स्वीकृत 200 से अधिक ऋण मामलों की जांच की मांग।

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