चंडीगढ़ में स्वास्थ्य स्टाफ का मुद्दा: सांसद मनीष तिवारी ने मांगा डेटा, मंत्री ने नीति की बात कहकर टाला जवाब

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नई दिल्ली/चंडीगढ़, 13 मार्च: चंडीगढ़ से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने आज लोकसभा में चंडीगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर ध्यान आकर्षित करते हुए अपने अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 3521 के माध्यम से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री से कई अहम मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा।

तिवारी ने सबसे पहले चंडीगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों के स्वीकृत पदों के बारे में जानकारी मांगी। उन्होंने पूछा कि कैडर और पद के आधार पर कितने डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं और चंडीगढ़ में डॉक्टरों के नए पद आखिरी बार कब बनाए गए थे। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी पूछा कि उस समय कितने पद बनाए गए थे, वे किस श्रेणी के थे और इस संबंध में जारी किए गए आदेशों का विवरण क्या है।

इसके बाद चंडीगढ़ के सांसद ने खाली पदों के बारे में भी विस्तृत जानकारी मांगी। उन्होंने विशेष रूप से मेडिसिन, सर्जरी, एनेस्थीसिया, रेडियोलॉजी और पीडियाट्रिक्स जैसी विशेषज्ञताओं के आधार पर रिक्तियों की जानकारी मांगी, ताकि डॉक्टरों की कमी की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके। इसके अलावा उन्होंने यह भी पूछा कि डॉक्टरों के पदों पर आखिरी बार नियमित भर्ती कब की गई थी, कितने पद भरे गए थे और वे किन-किन विशेषज्ञताओं से संबंधित थे।

तिवारी ने यह भी जानना चाहा कि इस समय चंडीगढ़ में कितने डॉक्टर प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर काम कर रहे हैं और वे किन-किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से आए हैं। इसके साथ ही उन्होंने पूछा कि क्या प्रतिनियुक्ति विशेषज्ञताओं की आवश्यकता के आधार पर की जाती है और इसके लिए क्या नीति या मानदंड लागू हैं।

दूसरी ओर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने तिवारी के सवालों के जवाब में चंडीगढ़ से संबंधित विशेष आंकड़े देने के बजाय यह कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल राज्यों का विषय है। उन्होंने जिम्मेदारी केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन पर डालते हुए कहा कि पदों का सृजन करना और रिक्तियों को भरना राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की मुख्य जिम्मेदारी होती है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, तिवारी ने कहा कि मंत्री ने उठाए गए विशिष्ट सवालों का जवाब नहीं दिया, न आंकड़े दिए, न तिथियां, न विशेषज्ञताओं के आधार पर जानकारी और न ही भर्ती या प्रतिनियुक्ति से संबंधित कोई विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने कहा कि यह “कूटनीतिक तरीके से सवाल टालने” का एक पुराना तरीका है।

तिवारी ने कहा कि उनकी दखल का उद्देश्य चंडीगढ़ में स्वास्थ्य स्टाफिंग के मुद्दे पर पारदर्शिता और जवाबदेही लाना था, लेकिन मंत्री के जवाब ने विशेष मुद्दों से बचते हुए केवल सामान्य नीति की बात की। उन्होंने कहा कि संसदीय परंपरा में अक्सर इस प्रकार के जवाबों को वास्तविक कमियों या खामियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बचने का तरीका माना जाता है।

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इस दौरान एक ऐसा क्षण भी आया जिसने सामान्य कूटनीतिक टालमटोल को तोड़ दिया, जब मनीष तिवारी ने चंडीगढ़ के स्वास्थ्य ढांचे की चौंकाने वाली वास्तविकता सामने रखी। उन्होंने कहा कि मुझे जानकार लोगों से यह समझ में आया है कि चंडीगढ़ में कुल डाक्टरों का विवरण इस प्रकार है, जिनमें 164 मेडिकल ऑफिसर (एम ओ), 28 सीनियर मेडिकल ऑफिसर (एस एम ओ) और लगभग 29 डेंटल एस एम ओ शामिल हैं, यानी कुल मिलाकर करीब 221 डॉक्टर हैं। इनमें से लगभग 180 डॉक्टर प्रतिनियुक्ति पर सेवाएं दे रहे हैं। यदि प्रतिनियुक्ति वाले डॉक्टरों को हटा दिया जाए, तो शहर के पास स्थानीय रूप से या अन्य तरीके से तैनात केवल लगभग 41 डॉक्टर ही बचते हैं। बिना किसी लाग-लपेट के तिवारी ने कहा कि शायद यही कारण है कि चंडीगढ़ प्रशासन और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय चंडीगढ़ के स्वास्थ्य ढांचे के कर्मचारियों की प्रोफाइल सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे।

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