चार धाम यात्रा में गैर हिंदुओं की एंट्री बैन! जानें बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम समेत किन मंदिरों में सिर्फ हिंदू जा सकेंगे

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उत्तराखंड: बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने एक अहम फैसला लेते हुए सोमवार यानी आज घोषणा की कि गैर-हिंदुओं को बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम और उसके कंट्रोल वाले दूसरे मंदिरों में घुसने नहीं दिया जाएगा।

यह निर्णय धार्मिक परंपराओं और मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया है।

समिति ने स्पष्ट किया है कि यह नियम सभी संबंधित मंदिरों पर समान रूप से लागू होगा. बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि केवल हिंदू श्रद्धालुओं को ही इन मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी. उन्होंने कहा कि इस संबंध में एक प्रस्ताव आगामी बोर्ड बैठक में पारित किया जाएगा, जिसके बाद इसे औपचारिक रूप से लागू कर दिया जाएगा।

क्यों लिया गया ये फैसला?

बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के सबसे प्राचीन और पवित्र धार्मिक स्थलों में गिने जाते हैं. ये दोनों मंदिर चार धाम यात्रा का अहम हिस्सा हैं और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. समिति का मानना है कि मंदिरों की परंपराओं और धार्मिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए यह फैसला जरूरी है।

कब खुलेंगें बद्रीनाथ धाम के कपाट?

इसी बीच बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख भी घोषित कर दी गई है. छह महीने के शीतकालीन अवकाश के बाद बद्रीनाथ मंदिर के कपाट 23 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे।

मंदिर अधिकारियों के अनुसार कपाट खुलने की शुभ तिथि और समय का निर्धारण नरेंद्र नगर स्थित टिहरी राजमहल में पारंपरिक पूजा और विधि विधान के बाद किया गया।

कब होगी चार धाम यात्रा 2026 की औपचारिक शुरुआत?

केदारनाथ धाम के साथ साथ छोटा चार धाम यात्रा में शामिल गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिरों के कपाट भी खुलने वाले हैं. गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के अवसर पर यानी 19 अप्रैल को खोले जाएंगे. इसके साथ ही उत्तराखंड में चार धाम यात्रा 2026 की औपचारिक शुरुआत हो जाएगी।

मंदिर समिति के इस फैसले के पीछे क्या है वजह?

मंदिर समिति के इस फैसले को लेकर धार्मिक और सामाजिक स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं. कुछ लोग इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे संवैधानिक मूल्यों के नजरिये से देख रहे हैं।

हालांकि समिति का कहना है कि यह निर्णय किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि परंपराओं के संरक्षण के लिए लिया गया है. अब सभी की नजरें मंदिर समिति की बोर्ड बैठक पर टिकी हैं, जहां इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगेगी।

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