पंजाब में फिर साथ आ सकते हैं अकाली दल-भाजपा ! सुखबीर बादल और सीआर पाटिल की मुलाकात से सियासी हलचल तेज

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2027 चुनाव से पहले गठबंधन की अटकलों को मिला जोर, 25% के संभावित संयुक्त वोट आधार पर टिकी नजरें

चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच संभावित गठबंधन को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। पिछले कुछ दिनों से चल रही अटकलों के बीच अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल की दिल्ली में पंजाब भाजपा के चुनाव प्रभारी सीआर पाटिल से हुई लंबी मुलाकात ने दोनों दलों के दोबारा करीब आने की संभावनाओं को हवा दे दी है।

सूत्रों के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच पंजाब के मौजूदा राजनीतिक हालात और 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीति को लेकर चर्चा हुई। हालांकि बैठक में किन मुद्दों पर बातचीत हुई, इसे लेकर अभी तक दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

भाजपा सार्वजनिक तौर पर पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कह रही है। इसके बावजूद सुखबीर बादल और सीआर पाटिल की मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में संभावित चुनावी तालमेल की चर्चाओं को फिर गर्म कर दिया है।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यदि दोनों दल गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय करना होगी। दोनों पार्टियों को यह भी देखना होगा कि गठबंधन में किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी और किन क्षेत्रों में कौन मजबूत स्थिति में है।

करीब 25% वोट शेयर का गणित

अकाली-भाजपा गठबंधन की संभावनाओं के पीछे सबसे अहम पहलू दोनों दलों का वोट गणित है। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल को करीब 18.38 प्रतिशत और भाजपा को करीब 6.60 प्रतिशत वोट मिले थे। दोनों का वोट शेयर जोड़ने पर यह आंकड़ा लगभग 25 प्रतिशत बनता है।

हालांकि राज्यव्यापी वोट प्रतिशत को सीधे विधानसभा सीटों में बदलना संभव नहीं है। पंजाब के चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय समीकरण, ग्रामीण-शहरी विभाजन, सामाजिक समीकरण और बूथ स्तर का संगठन नतीजों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। इसके बावजूद करीब 25 प्रतिशत का संयुक्त वोट आधार दोनों दलों के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत हो सकता है।

अकाली दल का ग्रामीण आधार, भाजपा की शहरी पकड़

दोनों दलों की राजनीतिक ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में रही है। अकाली दल का पारंपरिक आधार ग्रामीण पंजाब और सिख मतदाताओं के बीच रहा है, जबकि भाजपा का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी इलाकों और व्यापारी वर्ग में देखा जाता रहा है।

ऐसे में संभावित गठबंधन दोनों दलों को एक-दूसरे के मजबूत क्षेत्रों में राजनीतिक लाभ पहुंचा सकता है। अकाली दल को शहरी क्षेत्रों में भाजपा के संगठन और प्रभाव का फायदा मिल सकता है, जबकि भाजपा ग्रामीण इलाकों में अकाली दल के पारंपरिक नेटवर्क और वोट आधार का लाभ उठाने की कोशिश कर सकती है।

यही वजह है कि संभावित गठबंधन को केवल सीटों के बंटवारे के रूप में नहीं, बल्कि दो अलग राजनीतिक आधारों को एक मंच पर लाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

2022 में अलग-अलग लड़े थे चुनाव

2022 का पंजाब विधानसभा चुनाव अकाली दल और भाजपा ने अलग-अलग लड़ा था। इससे पहले दोनों दल लंबे समय तक गठबंधन में रहे थे। कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के मुद्दे पर दोनों के रिश्तों में खटास आई और गठबंधन टूट गया।

अब पंजाब की राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार है, कांग्रेस मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में मौजूद है, जबकि भाजपा पंजाब में अपना संगठन और जनाधार लगातार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर अकाली दल भी अपने पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव को फिर से मजबूत करने की दिशा में सक्रिय है।

गठबंधन हुआ तो बदल सकता है पंजाब का चुनावी समीकरण

2027 का विधानसभा चुनाव बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। ऐसे में अकाली दल और भाजपा का संभावित गठबंधन चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है। हालांकि गठबंधन की राह में सीट बंटवारा, नेतृत्व का सवाल, साझा चुनावी रणनीति और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल जैसी कई चुनौतियां भी होंगी।

फिलहाल दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन सुखबीर बादल और सीआर पाटिल की मुलाकात ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या 2027 के चुनाव में अकाली दल और भाजपा पुराने रिश्ते को नए राजनीतिक समीकरण के साथ दोबारा जिंदा करने की तैयारी कर रहे हैं?

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