श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने प्रथम प्रकाश पर्व पर किया श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश, सिख विरासत को विशेषज्ञों की देखरेख में संरक्षित करने की अपील
अमृतसर, 12 सितंबर। मलेशिया के पेनांग स्थित 125 वर्ष पुराने ऐतिहासिक बड़ा गुरुद्वारा साहिब को सेवा-संभाल के बाद उसके मूल स्वरूप के अनुरूप पुनः खोला गया। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने शनिवार को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रथम प्रकाश पर्व के अवसर पर गुरुद्वारा साहिब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश किया।
गुरुद्वारा साहिब की 125वीं स्थापना वर्षगांठ को समर्पित समारोह में बड़ी संख्या में संगत ने हिस्सा लिया। पेनांग के उपमुख्यमंत्री द्वितीय जगदीप सिंह दियो और बड़ा गुरुद्वारा साहिब प्रबंधक कमेटी के निमंत्रण पर मलेशिया पहुंचे जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह ने अमृतवेले पांच प्यारों की अगुआई में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पावन स्वरूप को दरबार साहिब में सुशोभित किया।
उन्होंने चौर साहिब की सेवा निभाने के बाद पावन बीड़ को पालकी साहिब में सुशोभित किया। इसके बाद अरदास कर दरबार की मर्यादा आरंभ की गई और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश किया गया। इस दौरान संगत ने हुकमनामा भी श्रवण किया।
सिख विरासत को संरक्षित करने की अपील
गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और पेनांग सरकार की ओर से गुरुद्वारा साहिब परिसर में भवन के पुनः शुभारंभ का विशेष समारोह भी आयोजित किया गया। इसमें मलेशिया सरकार के केंद्रीय मंत्री स्टीवन सिम, पेनांग के उपमुख्यमंत्री जगदीप सिंह दियो, बुकीत गलुगोर के सांसद रामकरपाल सिंह दियो, पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां, मलेशिया में भारतीय उच्चायुक्त सोमनाथ घोष, बड़ा गुरुद्वारा साहिब प्रबंधक कमेटी की प्रमुख नेता गुरमीत कौर और प्रधान संतोष सिंह सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।
जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह ने कहा कि पेनांग में सिख विरासत के प्रतीक बड़ा गुरुद्वारा साहिब को उसके मूल स्वरूप में संरक्षित करना सराहनीय प्रयास है। उन्होंने कहा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद सिख विरासत से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों को भी विशेषज्ञों की देखरेख में इसी तरह संरक्षित किया जाना चाहिए।
मलेशिया की आजादी में सिखों का योगदान
जत्थेदार ने कहा कि दुनिया के जिस भी हिस्से में सिख पहुंचे, उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का ओट-आसरा लेकर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखा। मलेशिया की आजादी में भी सिखों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कुआलालंपुर स्थित राष्ट्रीय स्मारक पर उन सिखों के नाम आज भी दर्ज हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया।
उन्होंने कहा कि पेनांग का बड़ा गुरुद्वारा साहिब वर्ष 1901 में स्थापित हुआ था। यह इस बात का प्रमाण है कि सिख 125 वर्ष पहले ही मलेशिया पहुंचकर मेहनत-मजदूरी करने लगे थे और उन्होंने गुरुद्वारा स्थापित कर संगत को एकजुट किया।
जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह ने गुरुद्वारा प्रबंधकों से नई पीढ़ी और बच्चों को गुरमुखी पंजाबी सिखाने के प्रयास करने की अपील की। उन्होंने कहा कि इससे बच्चे गुरबाणी और सिख इतिहास से आसानी से जुड़ सकेंगे।
उन्होंने मलेशिया की सिख संगत को पंजाब से जुड़े रहने तथा बच्चों को श्री दरबार साहिब अमृतसर और श्री ननकाना साहिब के दर्शन करवाने के लिए भी प्रेरित किया।
