भरमौर के विधायक डॉ. जनक राज का गरसा स्थित NTRS का दौरा : गद्दी भेड़ और अंगोरा खरगोश के संरक्षण पर विशेष जोर

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अनुसंधान कार्यों को मजबूत करने पर हुई चर्चा

एएम नाथ। कुल्लू : भरमौर के विधायक डॉ. जनक राज ने हाल ही में केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान के उत्तरी शीतोष्ण क्षेत्रीय स्टेशन (NTRS) गरसा, जिला कुल्लू का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने संस्थान द्वारा संचालित विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की और वैज्ञानिकों के साथ गहन चर्चा की। दौरे का उद्देश्य क्षेत्र में पशुपालन से जुड़े अनुसंधान कार्यों की प्रगति का आकलन करना और स्थानीय स्तर पर उनके प्रभाव को समझना था।
दौरे के दौरान विधायक ने विशेष रूप से गद्दी भेड़ और अंगोरा खरगोश की प्रजातियों के संरक्षण और संवर्धन से जुड़े प्रयासों पर गहरी रुचि दिखाई। वैज्ञानिकों ने उन्हें बताया कि गद्दी भेड़ हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक और महत्वपूर्ण नस्लों में से एक है, जो न केवल ऊन उत्पादन में योगदान देती है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले पशुपालकों की आजीविका का प्रमुख आधार भी है। इसके अलावा अंगोरा खरगोश से प्राप्त होने वाला महीन ऊन अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर मिलते हैं।
संस्थान के विशेषज्ञों ने जानकारी दी कि जलवायु परिवर्तन, चरागाहों की कमी और बदलती जीवनशैली के कारण इन पारंपरिक प्रजातियों पर खतरा बढ़ता जा रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए संस्थान उन्नत प्रजनन तकनीकों, बेहतर पोषण प्रबंधन और रोग नियंत्रण उपायों पर आधारित शोध कार्य कर रहा है। इसके साथ ही, स्थानीय पशुपालकों को समय-समय पर प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से आधुनिक तकनीकों से जोड़ा जा रहा है, ताकि वे अपनी उत्पादकता बढ़ा सकें और आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें।
डॉ. जनक राज ने संस्थान के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के अनुसंधान प्रयास प्रदेश की पारंपरिक पशुपालन प्रणाली को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन योजनाओं को और व्यापक स्तर पर लागू किया जाए, तो यह न केवल पशुपालकों की आय में वृद्धि करेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाएगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार इन प्रयासों को हर संभव सहयोग प्रदान करेगी।
दौरे के अंत में विधायक ने संस्थान के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के समर्पण और मेहनत की प्रशंसा की। उन्होंने भविष्य में भी इस प्रकार के अनुसंधान कार्यों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि पारंपरिक पशुधन प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन समय की मांग है, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए इन संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सके।

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