सीबीआई की एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से जस्टिस जेएस बेदी ने किया इनकार, धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी न लेने का उठाया मुद्दा
चंडीगढ़। पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष ड्यूटी अधिकारी (ओएसडी) के रूप में तैनात राजबीर सिंह घुम्मन को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिल पाई है। जस्टिस जेएस बेदी ने कहा कि यह मामला उनकी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि संबंधित एफआईआर हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश पर दर्ज की गई थी। अदालत ने याचिकाकर्ता को उचित मंच पर जाने की सलाह दी।
घुम्मन ने अपनी याचिका में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से दर्ज एफआईआर को चुनौती दी है। उन्होंने दावा किया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पंजाब सरकार से अनिवार्य पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई। उनके अनुसार, मामला सरकारी कार्यों और अधिकारियों की तैनाती तथा तबादलों से जुड़े कथित निर्णयों से संबंधित है, इसलिए इस प्रावधान के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।
हाई कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई थी एफआईआर
याचिका के अनुसार, 5 अक्टूबर 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई को मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। उसी दिन सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा-द्वितीय, नई दिल्ली ने मामला दर्ज किया। एफआईआर में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के साथ भारतीय न्याय संहिता की धाराएं भी शामिल की गई हैं।
घुम्मन का कहना है कि एफआईआर दर्ज होने के अगले दिन, 6 अक्टूबर को सीबीआई के सहायक पुलिस अधीक्षक ने चंडीगढ़ की विशेष अदालत से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 96 के तहत तलाशी वारंट प्राप्त किया। इसके बाद पंजाब के संगरूर जिले में स्थित उनके पैतृक गांव घराचों के आवास पर तलाशी ली गई।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि तलाशी के दौरान परिवार के सदस्य मौजूद नहीं थे और कार्रवाई देर रात तक जारी रही। ये आरोप याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए हैं।
धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी का मुद्दा
घुम्मन ने याचिका में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि सरकारी अधिकारी के आधिकारिक निर्णयों या सिफारिशों से संबंधित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत सक्षम सरकार की पूर्व स्वीकृति जरूरी है।
उन्होंने यह भी दावा किया है कि पंजाब सरकार ने वर्ष 2021 में इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया अपनाई थी, जिसके तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
एफआईआर और तलाशी कार्रवाई रद्द करने की मांग
याचिका में घुम्मन ने सीबीआई की एफआईआर रद्द करने, तलाशी वारंट और तलाशी कार्रवाई को अवैध घोषित करने तथा मामले में आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने पंजाब सरकार से संबंधित रिकॉर्ड पेश करने का अनुरोध भी किया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उनके खिलाफ धारा 17ए के तहत पूर्व स्वीकृति मांगी गई थी या नहीं और यदि मांगी गई थी तो क्या मंजूरी दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि संबंधित कार्रवाई से उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हैं। हालांकि, हाई कोर्ट की ओर से इस सुनवाई में याचिका के आरोपों या एफआईआर की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया गया। अदालत ने मामले के लिए उपयुक्त मंच का रुख करने की सलाह दी है।
