स्वामी भक्ति प्रसाद गिरि महाराज से विशेष संवाद श्रीमद्भागवत कथा के माध्यम से धर्म, आस्था और अध्यात्म पर गूढ़ विमर्श

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होशियारपुर/ दलजीत अजनोहा : वृन्दावन के प्रतिष्ठित संत एवं कथा व्यास स्वामी भक्ति प्रसाद गिरि महाराज से धर्म, आस्था और अध्यात्म के विविध पहलुओं पर एक विशेष संवाद का आयोजन किया गया। इस संवाद का उद्देश्य सनातन धर्म की मूलभावनाओं को जनमानस तक सरल व सुलभ रूप में पहुंचाना रहा।

बातचीत के दौरान स्वामी जी ने श्रीमद्भागवत कथा के दिव्य संदर्भों के माध्यम से बताया कि जीवन में आध्यात्मिकता का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण जीवन दर्शन को प्रभावित करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “हर व्यक्ति को अपने इष्ट देव को निष्ठा से मानना चाहिए। सनातन धर्म का मूल मंत्र ही यही है कि यदि आपका इष्ट आप पर कृपा दृष्टि बनाए हुए हैं, तो समस्त देवी-देवताओं की कृपा भी सहज ही प्राप्त होती है।”

स्वामी जी ने जोर देते हुए कहा कि “धर्म कोई बंधन नहीं है, यह तो आत्मा का मार्ग है। हर व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का अनुयायी हो, यदि वह अपने धर्म के अनुसार श्रद्धा व भक्ति से पूजा-अर्चना करता है, तो ईश्वर की असीम अनुकंपा उस पर बनी रहती है।”

संवाद के दौरान दलजीत अजनोहा ने स्वामी जी से वर्तमान समाज में बढ़ती धार्मिक उथल-पुथल, आस्था की गिरावट, युवाओं में आध्यात्मिक सोच की कमी जैसे विषयों पर भी प्रश्न किए। इन पर स्वामी जी ने कहा, “युवाओं को धर्म को बोझ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला साधन समझना चाहिए। आज की पीढ़ी को आध्यात्मिक शिक्षा और कथाओं के माध्यम से आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त किया जा सकता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि धर्म केवल पूजा विधियों तक सीमित न हो, बल्कि यह प्रेम, सेवा, सहिष्णुता और सदाचार का व्यवहारिक स्वरूप बनना चाहिए।

इस प्रेरणादायक बातचीत के अंत में स्वामी भक्ति प्रसाद गिरी महाराज ने यह संदेश दिया कि –
“धर्म को जीवन में आत्मसात करें, बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर से जुड़ाव रखें। तभी सच्चा अध्यात्म जाग्रत होता है और वही व्यक्ति को परमात्मा की ओर ले जाता है।”

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