चंडीगढ़ सेक्टर 47 माउंट कार्मल स्कूल फीस बढ़ोतरी मामला : आठ प्रतिशत से अधिक फीस वृद्धि अवैध करार, जिला अदालत ने 349 अभिभावकों को दी बड़ी राहत

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पुनीत महाजन। चंडीगढ़ :  सेक्टर-47 स्थित माउंट कार्मल स्कूल द्वारा वर्ष 2017-18 में की गई फीस बढ़ोतरी के मामले में जिला अदालत ने 349 अभिभावकों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्कूल प्रबंधन को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्कूल द्वारा की गई फीस वृद्धि को नियमों के विरुद्ध और अवैध करार देते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी निजी स्कूल एक शैक्षणिक वर्ष में 8 प्रतिशत से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अधिक फीस जमा न करने की स्थिति में किसी भी छात्र का दाखिला रोकना या उसे किसी प्रकार से परेशान करना गैरकानूनी होगा। कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि अभिभावक केवल 8 प्रतिशत तक बढ़ी हुई फीस देने के लिए ही बाध्य होंगे।
मामले की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब माउंट कार्मल स्कूल ने नर्सरी से लेकर 12वीं कक्षा तक की ट्यूशन फीस में भारी बढ़ोतरी की घोषणा की थी। अभिभावकों के अनुसार करीब 2700 रुपये मासिक फीस को बढ़ाकर 4800 से 4975 रुपये तक कर दिया गया था। इस फैसले का विरोध करते हुए अभिभावकों ने माउंट कार्मल पेरेंट्स एसोसिएशन का गठन किया और स्कूल प्रबंधन, चंडीगढ़ प्रशासन तथा सीबीएसई के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। उचित कार्रवाई न होने पर 349 अभिभावकों ने जिला अदालत में सिविल केस दायर किया।
सुनवाई के दौरान स्कूल प्रबंधन ने अदालत में दलील दी कि वह एक गैर-सहायता प्राप्त निजी संस्थान है और फीस निर्धारण का अधिकार उसके पास है। स्कूल ने यह भी कहा कि बढ़ोतरी का उद्देश्य बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं और बुनियादी ढांचे को बनाए रखना था। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और फीस वृद्धि को निर्धारित नियमों के विपरीत माना।
अभिभावकों ने अदालत को बताया कि फीस बढ़ोतरी से पहले पंजाब सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन दोनों ने निजी स्कूलों के लिए अधिकतम 8 प्रतिशत वार्षिक फीस वृद्धि की नीति लागू की थी। इसके बावजूद स्कूल ने मनमाने ढंग से फीस में भारी बढ़ोतरी कर दी।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वर्ष 2017-18 से लेकर आगे भी अभिभावक केवल 8 प्रतिशत तक बढ़ी हुई फीस का भुगतान करेंगे और स्कूल प्रबंधन इससे अधिक राशि वसूल नहीं कर सकेगा। यह फैसला निजी स्कूलों में फीस वृद्धि के मामलों में अभिभावकों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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