जंतर-मंतर जाने पर पाबंदी के साथ सीजेपी के तीन नेताओं को सशर्त रिहाई; बॉन्ड तोड़ने पर जब्त हो सकती है मुचलके की राशि, हो सकती है कानूनी कार्रवाई
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के तीन नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को सशर्त रिहा कर दिया गया है। दिल्ली कैंट स्थित स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने तीनों से स्पेशल बॉन्ड भरवाया है। इसके तहत उन्हें एक साल तक ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं होने की शर्त दी गई है, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो। साथ ही, उनके जंतर-मंतर जाने पर भी रोक लगाई गई है।
इस आदेश के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या तीनों नेता एक साल तक किसी भी प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकेंगे? कानूनी प्रावधानों के अनुसार, शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार पर पूरे एक साल के लिए रोक लग गई है। हालांकि, संबंधित मजिस्ट्रेट के आदेश में लगाई गई विशिष्ट शर्तों का पालन करना जरूरी होगा।
क्या है पूरा मामला?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया गया था। प्रदर्शन की अनुमति नहीं होने के कारण पुलिस ने वहां प्रदर्शनकारियों के जुटने पर पाबंदी लगा दी थी। 10 अक्टूबर को सीजेपी के अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को विमान से उतरने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया।
तीनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई की गई। रविवार सुबह उन्हें स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से बॉन्ड और अन्य शर्तों के आधार पर उन्हें रिहा कर दिया गया।
क्या कहती हैं बीएनएस की धाराएं?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी के अनुसार, इन प्रावधानों का संबंध शांति व्यवस्था बनाए रखने और संभावित अपराध को रोकने से है।
- धारा 126: शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बांड लेने से संबंधित प्रावधान है। परिस्थितियों के अनुसार मजिस्ट्रेट निर्धारित अवधि के लिए व्यक्ति से शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरवा सकता है।
- धारा 170: संज्ञेय अपराध किए जाने की आशंका से संबंधित परिस्थितियों में पुलिस को निवारक कार्रवाई के तहत बिना वारंट गिरफ्तारी करने का अधिकार देती है।
धारा 170 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है। इसके बाद शांति भंग की आशंका के आधार पर संबंधित कार्यवाही की जा सकती है।
क्या एक साल तक प्रदर्शन नहीं कर सकेंगे?
कानूनी जानकारों के मुताबिक, शांति बनाए रखने के बॉन्ड का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति हर तरह के शांतिपूर्ण प्रदर्शन से वंचित हो जाता है। शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखने का अधिकार बना रहता है, लेकिन इसके लिए लागू कानूनों और प्रशासनिक आदेशों का पालन करना आवश्यक है।
इस मामले में तीनों नेताओं पर जंतर-मंतर जाने की अलग शर्त भी लगाई गई है। इसलिए उनके लिए यह देखना जरूरी होगा कि अदालत के आदेश में इस प्रतिबंध का दायरा क्या है और वह किन परिस्थितियों में लागू होगा। आदेश की पूरी प्रति देखे बिना इस रोक की सटीक सीमा के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
बॉन्ड की शर्तें तोड़ने पर क्या होगा?
यदि कोई व्यक्ति बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई हो सकती है। निर्धारित परिस्थितियों में मुचलके की राशि जब्त की जा सकती है और शांति बनाए रखने से संबंधित आगे की कार्यवाही भी हो सकती है। यदि उल्लंघन के दौरान कोई अलग अपराध किया जाता है, तो उसके लिए भी कानून के मुताबिक कार्रवाई संभव है।
हालांकि, बॉन्ड की शर्त टूटने का अर्थ हर स्थिति में अपने आप जेल जाना नहीं है। कार्रवाई संबंधित कानून, उल्लंघन की प्रकृति और सक्षम प्राधिकारी के आदेश पर निर्भर करेगी।
शांतिपूर्ण विरोध और कानूनी शर्तों के बीच संतुलन
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अदालत द्वारा लगाई गई शर्तें किस सीमा तक लागू होती हैं। एक ओर प्रशासन को सार्वजनिक शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसलिए सीजेपी के तीनों नेताओं के मामले में अंतिम स्थिति समझने के लिए मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश और बॉन्ड की वास्तविक शर्तों को देखना जरूरी होगा। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उन्हें एक साल तक हर प्रकार के प्रदर्शन से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
