जोगिंद्रा बैंक में ऋण अनियमितताओं का आरोप, NABARD से हस्तक्षेप की मांग

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2017 की जांच रिपोर्ट का हवाला, तत्कालीन अधिकारी राम पाल की भूमिका पर उठे सवाल

अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने की पुराने ऋणों की वसूली और NPA खातों की दोबारा जांच की मांग

एएम नाथ। सोलन : जोगिंद्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में कथित ऋण अनियमितताओं और बैंक के धन को जोखिम में डालने के मामले में नाबार्ड के मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट, चंडीगढ़ के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने शिकायत में तत्कालीन अधिकारी और वर्तमान AGM राम पाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, राम पाल की तैनाती के दौरान अर्की, दाड़लाघाट और ससेवड़ा चंडी शाखाओं में बैंक नियमों की कथित अनदेखी करते हुए कई ऋण स्वीकृत एवं वितरित किए गए। शिकायतकर्ता ने 26 सितंबर 2017 की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि रिपोर्ट में राम पाल को 31 बार ‘Delinquent Officer’ और 59 बार ‘Charged Officer’ के रूप में उल्लेखित किया गया था।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि एक ही परिवार के कई सदस्यों को अलग-अलग शाखाओं से SCC, SSI और KCC जैसी ऋण योजनाओं के तहत ऋण दिए गए। आरोप है कि कुछ मामलों में पहले से ऋण होने और खातों के ओवरड्यू अथवा NPA होने के बावजूद नए ऋण स्वीकृत किए गए। शिकायतकर्ता के अनुसार, ऋण लेने वालों की भुगतान क्षमता का पर्याप्त आकलन और पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई।
मामले में बृज लाल, चेत राम और नीम चंद सहित एक ही परिवार से जुड़े लोगों को दिए गए ऋणों का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि राम पाल ने बृज लाल को आठ अलग-अलग ऋण मामलों में गारंटर के रूप में स्वीकार किया, जिसकी बैंक नियमों के तहत जांच की जानी चाहिए। शिकायत में दावा किया गया है कि इनमें से अधिकांश ऋण खाते बाद में NPA हो गए।
अधिवक्ता शर्मा के अनुसार, वर्ष 2010-11 में बृज लाल से संबंधित ऋणों में करीब 21 लाख रुपये की मूल राशि और ब्याज अब भी बकाया बताया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने लंबे समय में बैंक की रिकवरी व्यवस्था ने प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि पूर्व जांच में गंभीर टिप्पणियों के बावजूद राम पाल के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और उन्हें पदोन्नतियां मिलती रहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे अधिकारी को बाद में अन्य मामलों में जांच अधिकारी की जिम्मेदारी कैसे दी गई।
नाबार्ड से संबंधित ऋण खातों की दोबारा समीक्षा, बैंक को हुए संभावित वित्तीय नुकसान का आकलन, लंबित ऋणों की वसूली की जांच तथा राम पाल, बृज लाल और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका तय करने की मांग की गई है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

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