ट्रंप ने रखी 6 शर्तें : जंग के बीच अब अमेरिका-ईरान तैयार हुए बातचीत के लिए ! पर्दे के पीछे चल रहा खेल

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नई दिल्ली  : पश्चिम एशिया में पिछले 23 दिनों से जारी जंग के बीच अब एक बड़ा मोड़ आता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां एक तरफ सैन्य कार्रवाई बढ़ाने की धमकी दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी टीम ने ईरान के साथ संभावित शांति वार्ता की तैयारी भी शुरू कर दी है।

ट्रंप ने शुक्रवार को खुद संकेत दिया है कि वह जंग को ‘धीरे-धीरे खत्म’ करने पर विचार कर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि अभी 2 से 3 हफ्ते और लड़ाई जारी रह सकती है. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक इसी बीच वॉशिंगटन अब डिप्लोमेसी का रास्ता भी तैयार कर रहा है।

पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और सलाहकार स्टीव विटकॉफ इस संभावित बातचीत की रणनीति तैयार कर रहे हैं. हालांकि अभी अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत नहीं हुई है, लेकिन मिस्र, कतर और ब्रिटेन के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान जारी है. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन उसने बेहद कड़ी शर्तें रखी हैं।

ईरान की क्या हैं शर्तें

  1. पहले युद्धविराम.
  2. भविष्य में हमला न करने की गारंटी.
  3. युद्ध का मुआवजा. हालांकि ट्रंप प्रशासन इन शर्तों को मानने के मूड में नहीं दिख रहा, खासकर सीजफायर और मुआवजे को लेकर।

अमेरिका की 6 बड़ी शर्तें क्या हैं?

अमेरिका चाहता है कि किसी भी समझौते से पहले ईरान ये 6 बड़े वादे करे.

  1. अगले 5 साल तक कोई मिसाइल कार्यक्रम नहीं.
  2. यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) पूरी तरह बंद.
  3. नतांज, इस्फहान और फोर्डो परमाणु ठिकानों को खत्म करना.
  4. परमाणु गतिविधियों पर कड़ी अंतरराष्ट्रीय निगरानी.
  5. क्षेत्रीय देशों के साथ हथियार नियंत्रण समझौता जिसके तहत मिसाइल सीमा 1000 किमी तक होगी.
  6. हिज्बुल्लाह, हूती और हमास जैसे संगठनों को फंडिंग देना बंद करना. यानी साफ है कि अमेरिका सिर्फ जंग खत्म नहीं करना चाहता, बल्कि ईरान की सैन्य और परमाणु ताकत को पूरी तरह सीमित करना चाहता है।

ईरान क्यों नहीं मान रहा?

ईरान पहले भी इन शर्तों को खारिज कर चुका है. तेहरान का मानना है कि अमेरिका भरोसे के लायक नहीं है, क्योंकि पहले भी बातचीत के बाद अचानक हमले किए गए हैं. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने शनिवार को साफ कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को सामान्य करने के लिए जरूरी है कि अमेरिका और इजराइल पहले हमले बंद करें और भविष्य में न करने का वादा करें. यानी ईरान पहले सुरक्षा चाहता है, जबकि अमेरिका पहले नियंत्रण चाहता है. यही टकराव की असली वजह है।

आगे क्या होगा?

अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि बातचीत किसके जरिए और किस स्तर पर होगी. अमेरिका यह तय कर रहा है कि ईरान में असली फैसला लेने वाला कौन है और कौन सा देश सबसे बेहतर मध्यस्थ होगा. ओमान पहले मध्यस्थ था, लेकिन अब अमेरिका कतर को आगे लाना चाहता है. हालांकि कतर पर्दे के पीछे मदद को तैयार है, लेकिन सामने आकर भूमिका निभाने में हिचक रहा है. ट्रंप खुद बातचीत के लिए तैयार तो दिखते हैं, लेकिन फिलहाल सीजफायर के पक्ष में नहीं है।

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