नई लोकसभा में पंजाब को 19 , हिमाचल को 5 और हरियाणा को मिल सकती 18 सीटें : लोकसभा की सीटों के परिसीमन  को लेकर जो मसौदा उभर रहा

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चंडीगढ़ : देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आकार लेता दिख रहा है। महिला आरक्षण को जमीन पर उतारने की कवायद के बीच लोकसभा की सीटों के परिसीमन  को लेकर जो मसौदा उभर रहा है, वह उत्तर भारत की राजनीति की तस्वीर बदल सकता है।

शुरुआती विश्लेषणों के अनुसार, लोकसभा की कुल सदस्य संख्या वर्तमान 543 से बढ़कर 850 हो सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों के पास सदन में पहले से कहीं अधिक ताकत होगी।

14 लाख की आबादी पर एक सांसद का फॉर्मूला

वर्तमान परिसीमन योजना के पीछे गणित काफी सरल लेकिन दूरगामी है। ड्राफ्ट बिलों के प्रारंभिक अध्ययन से पता चलता है कि सरकार 2026 की जनगणना की प्रतीक्षा करने के बजाय 2011 की जनगणना को ही आधार बना सकती है।

इस प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत देश की 1.2 अरब (2011 के अनुसार) आबादी को 850 सीटों से विभाजित किया गया है। इसका परिणाम लगभग 14 लाख आता है। यानी हर 14 लाख की आबादी पर एक लोकसभा सीट आवंटित की जा सकती है। इसी आधार पर राज्यों की सीटों का नया गणित तैयार किया गया है।

उत्तर भारत के राज्यों में सीटों का बंटवारा जनसंख्या के इस नए पैमाने पर काफी दिलचस्प नजर आता है:

हरियाणा: सबसे उल्लेखनीय वृद्धि हरियाणा में देखने को मिल सकती है। राज्य की 2.53 करोड़ की आबादी के हिसाब से इसकी सीटें 10 से बढ़कर 18 हो सकती हैं। यह न केवल सीटों की संख्या में वृद्धि है, बल्कि लोकसभा में राज्य की हिस्सेदारी भी 1.8% से बढ़कर 2.1% हो जाएगी।

पंजाब: पंजाब की नुमाइंदगी भी 13 से बढ़कर 19 सीटों तक पहुंच सकती है। हालांकि, संख्या बढ़ने के बावजूद कुल सदन में पंजाब की प्रतिशत हिस्सेदारी (2.4% से गिरकर 2.1%) मामूली रूप से कम हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश : छोटे पहाड़ी राज्य हिमाचल की सीटें 4 से बढ़कर 5 होने का अनुमान है।

जम्मू-कश्मीर: सीमावर्ती केंद्र शासित प्रदेश में भी बड़ा बदलाव दिखेगा, जहां सीटें 5 से बढ़कर 9 हो सकती हैं।

उत्तर प्रदेश 143 सीटों के साथ बनेगा किंगमेकर  : इस नए फॉर्मूले का सबसे बड़ा लाभार्थी उत्तर प्रदेश होगा। करीब 20 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की सीटें 80 से सीधे 143 तक पहुंच सकती हैं। वर्तमान में यूपी की हिस्सेदारी सदन में 14.7% है, जो बढ़कर 16.8% हो जाएगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या किसी भी दल के लिए केंद्र की सत्ता का रास्ता बेहद आसान या मुश्किल बना सकती है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व पर छिड़ी बहस

इस योजना को लेकर राजनीतिक गलियारों में विरोध के स्वर भी हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि जनसंख्या आधारित मॉडल उन राज्यों के लिए ‘सजा’ जैसा है जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है। विपक्ष की मांग है कि ‘आनुपातिक प्रणाली’ (Proportional System) अपनाई जाए, जिसमें राज्यों की सीटों का प्रतिशत मौजूदा स्तर पर ही स्थिर रहे।

उदाहरण के तौर पर: यदि आनुपातिक सिस्टम लागू होता है, तो पंजाब को 19 के बजाय 20 सीटें और हिमाचल को 5 के बजाय 6 सीटें मिलनी चाहिए।

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