पंजाब में सियासी हलचल, अमृतपाल सिंह की नई पार्टी के नाम का हुआ ऐलान, अध्यक्ष के नाम पर लगी मुहर

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माघी मेला कॉन्फ्रेंस के दौरान खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी के नाम की घोषणा की. इस मंच पर जयकारों के बीच पार्टी का नाम “अकाली दल (पंजाब का वारिस)” रखा गया और अमृतपाल सिंह को इसका मुख्य सेवक घोषित किया गया। अगले तीन महीने में इस पार्टी में नई भर्तियां की जाएंगी।  जिसके बाद बैसाखी के मौके पर पार्टी के नए अध्यक्ष की घोषणा की जाएगी।
कमेटी का गठन :   गौरतलब है कि असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया है।  फिलहाल, अमृतपाल पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया है और जेल में होने के कारण पार्टी संचालन के लिए एक कमेटी का गठन किया गया है। इस दौरान अमृतपाल के पिता तरसेम सिंह और फरीदकोट से निर्दलीय सांसद सरबजीत सिंह भी कार्यक्रम में मौजूद थे। पार्टी नेता जसकरन सिंह काहन सिंह वाला ने बताया कि पार्टी के नाम के लिए तीन विकल्प चुनाव आयोग को भेजे गए थे, जिनमें से यह नाम मंजूर किया गया।
जसकरन सिंह ने पार्टी के उद्देश्यों पर चर्चा करते हुए कहा कि यह दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली की सरकार किसानों की जान ले रही है और सिख समुदाय को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली की सोच पंजाब के पानी पर कब्जा करने की कोशिश कर रही है और सिखों को बंधक बनाने की साजिश रच रही है।
शिरोमणि अकाली दल (बादल) के लिए बड़ी चुनौती :   राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमृतपाल सिंह द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाना शिरोमणि अकाली दल (बादल) के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है।  अकाली दल अब तक पंथ का प्रमुख प्रतिनिधि रहा है, लेकिन 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान और डेरा सिरसा प्रमुख राम रहीम को माफी देने के विवाद के बाद अकाली दल का ग्राफ गिरा है।  इसका असर पंथक वोट बैंक पर पड़ा है, जो अब नए विकल्प तलाश रहा है।
पंजाब की राजनीति पर गहरा असर :   विशेषज्ञों का कहना है कि अमृतपाल सिंह की पार्टी का पंजाब की राजनीति पर गहरा असर हो सकता है, जिस तरह से अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह ने निर्दलीय चुनाव में पंथक वोटरों से जीत हासिल की थी। उनकी पार्टी के गठन के बाद सिख वोट बैंक का रुझान उनकी ओर हो सकता है। इसका नुकसान शिरोमणि अकाली दल को हो सकता है। हालांकि, यह इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे पहले भी कई सिख पार्टियां बनी हैं, लेकिन वे सफलता हासिल नहीं कर पाईं।
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