एएम नाथ। शिमला : हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट के बीच प्रदेश के कर्मचारियों की लंबित वित्तीय देनदारियों का मुद्दा एक बार फिर प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया है। लंबे समय से अपनी वैध मांगों के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारी अब लगातार बढ़ती देरी को लेकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार हर बजट में उनकी मांगों को “चरणबद्ध तरीके से” पूरा करने का आश्वासन तो देती है, लेकिन इन घोषणाओं का धरातल पर कोई ठोस परिणाम अब तक देखने को नहीं मिला है।
कर्मचारियों की प्रमुख मांगों में 13 प्रतिशत दैनिक भत्ता (DA), वर्ष 2016 के वेतन आयोग का एरियर और लगभग 132 महीनों से लंबित डीए एरियर शामिल हैं। इन देनदारियों के भुगतान में लगातार हो रही देरी से कर्मचारियों के आर्थिक संतुलन पर भी असर पड़ रहा है। कई कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि कर्मचारियों के सम्मान और अधिकारों से भी जुड़ा विषय है।
कर्मचारियों में इस बात को लेकर भी गहरी नाराजगी है कि उन्हें अपनी मांगों को सोशल मीडिया के माध्यम से रखने और नीतियों के विरोध में अपनी आवाज उठाने पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। उनका मानना है कि यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। कर्मचारी संगठनों ने इस प्रतिबंध को तत्काल हटाने की मांग की है।
प्रदेश के विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली, सभी लंबित वित्तीय देनदारियों के भुगतान के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना घोषित की जाए। दूसरी, 13 प्रतिशत दैनिक भत्ता और उसके एरियर का जल्द से जल्द भुगतान सुनिश्चित किया जाए। तीसरी, वर्ष 2016 के वेतन आयोग के एरियर का तत्काल निपटारा किया जाए। और चौथी, कर्मचारियों पर लगाए गए सोशल मीडिया प्रतिबंध को तुरंत प्रभाव से हटाया जाए।
कर्मचारियों का कहना है कि वे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ हैं और उनके अधिकारों की अनदेखी लंबे समय तक नहीं की जा सकती। उनका यह भी कहना है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लेती है, तो वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
अब देखना यह होगा कि सरकार आगामी समय में इन मांगों को लेकर क्या ठोस कदम उठाती है। फिलहाल, कर्मचारियों की नजरें सरकार के फैसलों पर टिकी हुई हैं और वे एक स्पष्ट एवं ठोस समाधान की उम्मीद कर रहे हैं।
