‘सतलुज’ का विरोध धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि आतंकवाद के खिलाफ है: रवनीत सिंह बिट्टू

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चंडीगढ़ : दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ विवाद के बीच केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने सोमवार को कहा कि उनकी आपत्ति किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि आतंकवाद, हिंसा और रक्तपात के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि सिख धर्म भी ‘शांति, साहस, त्याग और मानवता की सेवा’ का प्रतीक है। बिट्टू ने न्यायपालिका, सशस्त्र बलों, लोक प्रशासन, व्यापार, खेल, साहित्य और विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में सिख समुदाय के सदस्यों के योगदान पर प्रकाश डाला।उन्होंने राष्ट्र की सेवा करने वाले और वैश्विक ख्याति प्राप्त करने वाले प्रतिष्ठित सिख व्यक्तित्वों के उदाहरण देते हुए कहा कि ये योगदान सिख धर्म के सच्चे मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उन्होंने इन योगदानों की तुलना पंजाब में उग्रवाद के दौरान हुई हिंसा से करते हुए कहा कि आतंकवाद के कारण हजारों निर्दोष लोगों की जान गई, जिनमें नागरिक, बस यात्री, पुलिसकर्मी और सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को सिख धर्म के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। बिट्टू ने यहां मीडिया से बातचीत के दौरान सिखों की तस्वीरें भी दिखाईं, जो उनके और पूरी दुनिया के लिए आदर्श हैं।

मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की पत्नी परमजीत कौर खालरा द्वारा अपने पति से संबंधित मामलों की ‘जांच आयोग’ गठित करने की मांग पर बिट्टू ने कहा कि वे निर्दोष नागरिकों, बस यात्रियों, पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों की हत्याओं की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि सभी तथ्यों की उचित प्रक्रिया के माध्यम से जांच की जानी चाहिए और एक विश्वसनीय संस्थागत तंत्र के माध्यम से सच्चाई सामने आनी चाहिए। फिल्म ‘सतलुज’ के संदर्भ में बिट्टू ने चिंता व्यक्त की कि ऐतिहासिक घटनाओं को संतुलित तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने फिल्म के कुछ पहलुओं पर सवाल उठाए, जिनमें 25,000 कथित लापता शवों के आंकड़े का स्रोत और कुछ ऐतिहासिक हस्तियों और घटनाओं का चित्रण शामिल है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव को याद करते हुए बिट्टू ने बताया कि उनके दादा, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह, की 31 अगस्त, 1995 को हत्या कर दी गई थी।उन्होंने सितंबर 1995 में खालरा के लापता होने का भी जिक्र किया और कहा कि उस दौर की हिंसा के कारण दोनों परिवारों को पीड़ा झेलनी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि पीड़ितों की पीड़ा का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए और खालरा की पत्नी से मिलने की इच्छा जताई।

उन्होंने यह भी कहा कि 1992 से 1995 के बीच खालरा ने अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया और उन्हें कभी भी किसी भी गतिविधि से नहीं रोका गया, न ही उनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज की गई।

 

 

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