सवालों के घेरे में कॉलेज : चुप्पी के कटघरे में सिस्टम धर्मशाला कॉलेज की छात्रा पल्लवी की मौत का मामला

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कॉलेज प्रशासन ने चेतावनी के संकेतों को किया नजरअंदाज

शिकायत करने वाले छात्र को पहले ही समस्या मान लिया जाता

एएम नाथ। धर्मशाला :  धर्मशाला कॉलेज की छात्रा पल्लवी की मौत सिर्फ एक युवती की असमय विदाई नहीं है, बल्कि यह हमारी शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनहीनता और कैंपस कल्चर पर एक कठोर सवाल है। यह मामला हमें झकझोरता है कि क्या आज भी कॉलेज और विश्वविद्यालय छात्रों के लिए सुरक्षित, संवेदनशील और न्यायपूर्ण स्थान हैं।मानसिक प्रताड़ना, रैगिंग, संस्थान के भीतर भय और चुप्पी का माहौल। वे किसी एक व्यक्ति या एक कॉलेज तक सीमित नहीं हैं। यह उस सड़ी-गली व्यवस्था का संकेत हैं, जहां शिकायत करने वाले छात्र को पहले ही समस्या मान लिया जाता है और आरोपों को दबाने की कोशिशें शुरू हो जाती है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि अगर हालात इतने खराब थे, तो समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ?
क्या कॉलेज प्रशासन ने चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज किया। क्या प्रोफेसर, वार्डन और जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ फाइलों और नियमों तक सीमित रह गए और क्या छात्राओं की मानसिक सेहत को अब भी “व्यक्तिगत कमजोरी” मानकर टाल दिया जाता है?
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रैगिंग और मानसिक उत्पीड़न, कानून है, लेकिन डर भी…

भारत में रैगिंग के खिलाफ सख्त कानून और यूजीसी गाइडलाइंस मौजूद हैं, फिर भी ऐसे मामले सामने आना यह बताता है कि कानून का डर जमीन पर कमजोर पड़ चुका है। कई बार रैगिंग सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक उत्पीड़न के रूप में सामने आती है—जो धीरे-धीरे छात्र को भीतर से तोड़ देती है।
पल्लवी का मामला इसी मानसिक उत्पीड़न की ओर इशारा करता है, जहां पीड़ित चुप रहने को मजबूर होता है, क्योंकि उसे डर होता है बदनामी का, करियर के नुकसान का, और अकेले पड़ जाने का।
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प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए

किसी भी छात्रा की मौत के बाद सिर्फ निलंबन, जांच और बयानबाजी काफी नहीं है। यह समय जवाबदेही तय करने का है।
क्या कॉलेज में एंटी-रैगिंग कमेटी सक्रिय थी? क्या शिकायत तंत्र भरोसेमंद था? क्या छात्राओं के लिए काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता मौजूद थी। अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं, तो यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता है।
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समाज और सिस्टम दोनों को आईना दिखाती ये मौत

पल्लवी की मौत हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि हम किस तरह का शैक्षणिक माहौल बना रहे हैं। जहां प्रतिस्पर्धा है, लेकिन संवेदना नहीं; जहां अनुशासन है, लेकिन संवाद नहीं; और जहां नियम हैं, लेकिन इंसानियत नहीं।
यह सिर्फ प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह पीड़ित के साथ खड़ा हो, सवाल पूछे और दबाव बनाए।ताकि मामला ठंडे बस्ते में न जाए। पल्लवी की मौत को अगर हमने एक और खबर बनाकर भुला दिया, तो यह हमारी सामूहिक हार होगी। जरूरत है कि इस मामले को न्याय की मिसाल बनाया जाए, ताकि आने वाले समय में कोई और पल्लवी चुपचाप टूटने को मजबूर न हो। अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो सवाल सिर्फ एक छात्रा की मौत का नहीं रहेगा, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की साख का होगा।

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