सीरियल नंबर 168896 ने खोला राज; लाहौर से फिल्लौर, फिल्लौर से इंदौर और फिर हुसैनीवाला पहुंची शहीद-ए-आजम की ऐतिहासिक निशानी
चंडीगढ़। । नवंबर 2016 में मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित बीएसएफ के ट्रेनिंग सेंटर में अधिकारियों की एक टीम पुराने हथियारों के रिकॉर्ड खंगाल रही थी। मकसद था एक ऐसी पिस्तौल की पहचान करना, जिसके बारे में दस्तावेजों में महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज थी। पिस्तौल सामने थी, लेकिन उस पर काला पेंट चढ़ा हुआ था।
एक-एक कर पिस्तौलों से पेंट हटाया गया। पहली और दूसरी पिस्तौल से कोई सुराग नहीं मिला। तीसरी पिस्तौल की सफाई शुरू हुई तो उसके शरीर पर दर्ज नंबर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा—168896।
यही वह नंबर था, जिसकी तलाश लंबे समय से की जा रही थी।
रिकॉर्ड से नंबर का मिलान हुआ तो सामने आया कि यह कोई सामान्य हथियार नहीं, बल्कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह से जुड़ी ऐतिहासिक .32 बोर कोल्ट सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल थी। करीब 88 साल तक गुमनामी में रहने के बाद इस ऐतिहासिक हथियार की पहचान दोबारा सामने आई।
सांडर्स हत्याकांड से जुड़ा है पिस्तौल का इतिहास
17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सांडर्स की हत्या कर दी गई थी। यह कार्रवाई लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के उद्देश्य से की गई थी। भगत सिंह और शिवराम राजगुरु इस कार्रवाई में शामिल थे।
इस मामले से जुड़े दस्तावेजों और बाद की जांच में जिस पिस्तौल का सीरियल नंबर 168896 दर्ज था, वही हथियार वर्षों बाद इंदौर में मिला।
असेंबली बम कांड के समय भी भगत सिंह के पास थी
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका। इसके बाद दोनों ने गिरफ्तारी दी।
बताया जाता है कि गिरफ्तारी के समय भगत सिंह के पास यही कोल्ट पिस्तौल थी। पुलिस ने हथियार जब्त कर लिया और बाद में यह लाहौर षड्यंत्र केस की महत्वपूर्ण केस प्रॉपर्टी का हिस्सा बनी।
बैलिस्टिक जांच में भी हुआ था इस्तेमाल
लाहौर षड्यंत्र केस के दौरान सांडर्स हत्याकांड से जुड़े कारतूसों और गोलियों की फॉरेंसिक जांच कराई गई थी। उपलब्ध दस्तावेजों में पिस्तौल का सीरियल नंबर 168896 दर्ज था। यही नंबर बाद में इंदौर में मिली पिस्तौल की पहचान का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना।
लाहौर से फिल्लौर तक पहुंची पिस्तौल
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिए जाने के बाद सांडर्स हत्याकांड और लाहौर षड्यंत्र केस से जुड़े सबूत पुलिस रिकॉर्ड में रहे।
बाद के वर्षों में यह पिस्तौल पंजाब पहुंची और फिल्लौर स्थित पंजाब पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के आर्म्स ब्यूरो म्यूजियम में रखी गई।
इसके बाद कहानी ने एक और मोड़ लिया।
1960 के दशक में इंदौर पहुंचा हथियारों का जत्था
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद सीमा सुरक्षा के लिए एक अलग बल की जरूरत महसूस हुई और आगे चलकर बीएसएफ का गठन 1965 में हुआ। इंदौर में केंद्रीय हथियार एवं रणनीति प्रशिक्षण संस्थान (CSWT) की स्थापना के दौरान विभिन्न राज्यों से पुराने और ऐतिहासिक हथियार प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन के लिए मंगाए गए।
फिल्लौर से भेजे गए पुराने हथियारों के इसी जत्थे में भगत सिंह से जुड़ी यह पिस्तौल भी इंदौर पहुंच गई।
काले पेंट ने छिपा दिया था इतिहास
इंदौर के संग्रहालय में पिस्तौल लंबे समय तक एक सामान्य पुराने हथियार की तरह रखी रही। पुराने हथियारों को जंग से बचाने के लिए उन पर काला पेंट कर दिया गया था।
पेंट की मोटी परत के कारण पिस्तौल पर दर्ज सीरियल नंबर 168896 दिखाई नहीं देता था। यही वजह रही कि दशकों तक किसी को इसकी ऐतिहासिक पहचान का पता नहीं चल पाया।
दस्तावेजों से शुरू हुई खोज
इस पिस्तौल की पहचान दोबारा सामने लाने की प्रक्रिया में पत्रकार जुपिंदरजीत सिंह और इतिहासकार मविंदरजीत सिंह वराइच के शोध को महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों लाहौर षड्यंत्र केस से जुड़े दस्तावेजों और रिकॉर्ड का अध्ययन कर रहे थे।
पुराने अदालती रिकॉर्ड में दर्ज पिस्तौल के सीरियल नंबर ने जांच की दिशा तय की। इसके बाद फिल्लौर से इंदौर भेजे गए पुराने हथियारों के रिकॉर्ड को खंगाला गया।
नवंबर 2016 में बीएसएफ अधिकारियों ने पुराने रजिस्टर और स्टॉक रिकॉर्ड की जांच शुरू की। रिकॉर्ड में मिले सुरागों के आधार पर संग्रहालय में रखी पिस्तौलों की पहचान की गई।
तीसरी पिस्तौल ने खोल दिया 88 साल पुराना राज
तीन पिस्तौलों पर संदेह गया। उनके ऊपर चढ़े काले पेंट को सावधानी से हटाया गया।
पहली और दूसरी पिस्तौल से अपेक्षित नंबर नहीं मिला। तीसरी पिस्तौल की सतह साफ की गई तो नंबर सामने आया—
168896
रिकॉर्ड से मिलान होते ही यह स्पष्ट हुआ कि जिस हथियार की तलाश दस्तावेजों के जरिए की जा रही थी, वह सामने मौजूद था।
एक साधारण दिखने वाली पिस्तौल के साथ जुड़ा करीब नौ दशक पुराना इतिहास अचानक फिर सामने आ गया।
अब हुसैनीवाला में सुरक्षित है ऐतिहासिक निशानी
पिस्तौल की पहचान सामने आने के बाद इसे पंजाब वापस लाने की मांग उठी। अक्टूबर 2017 में इसे इंदौर से पंजाब लाया गया और फिरोजपुर के हुसैनीवाला स्थित बीएसएफ म्यूजियम में रखा गया।
हुसैनीवाला वही ऐतिहासिक स्थल है, जहां शहीद भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव की शहादत के बाद सतलुज नदी के किनारे अंतिम संस्कार किया गया था।
आज यह पिस्तौल एक विशेष कांच के बॉक्स में सुरक्षित रखी गई है। यह सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर की ऐतिहासिक निशानी है, जब भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपने तरीके से संघर्ष किया।
88 साल तक काले पेंट के नीचे छिपा रहा सीरियल नंबर 168896 आखिरकार इतिहास को फिर सामने ले आया।
