एएम नाथ। शिमला । हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों को सेब का आकार और लंबाई बढ़ाने का दावा कर महंगे प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (PGR) बेचे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि संबंधित रसायन बागवानों को 14 हजार से 16,500 रुपये प्रति लीटर तक की कीमत में बेचे गए। कई बागवानों ने इन उत्पादों के इस्तेमाल पर लाखों रुपये खर्च किए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद उन्होंने इसकी शिकायत बागवानी विभाग से की।
शिकायत के बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया है। बागवानी विभाग ने मामला विजिलेंस ब्यूरो को सौंप दिया है, जिसके बाद प्रारंभिक जांच शुरू कर दी गई है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि संबंधित उत्पाद वास्तव में अधिकृत निर्माता से आया था या इसमें स्थानीय स्तर पर किसी तरह की मिलावट या छेड़छाड़ की गई।
विदेशी कंपनी के PGR उत्पाद पर सवाल
बताया जा रहा है कि मामला एक विदेशी कंपनी के PGR उत्पाद से जुड़ा है। बागवानों को कथित तौर पर यह उत्पाद सेब का आकार और लंबाई बढ़ाने तथा फल को अधिक आकर्षक बनाने के दावे के साथ उपलब्ध कराया गया।
बागवानों का कहना है कि महंगे रसायन खरीदकर बगीचों में छिड़काव करने के बावजूद कई जगहों पर सेब के आकार और लंबाई में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने उत्पाद की गुणवत्ता और प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हुए विभाग से शिकायत की।
सैंपल जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे
मामले की जांच के तहत बागवानी विभाग ने संबंधित PGR के सैंपल एकत्र कर प्रयोगशाला भेजे हैं। अब रिपोर्ट का इंतजार है। प्रयोगशाला जांच से यह पता चल सकेगा कि उत्पाद में लेबल पर बताए गए सक्रिय रसायन मौजूद हैं या नहीं और उनकी मात्रा निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं।
यदि जांच में उत्पाद की संरचना में गड़बड़ी या मिलावट की पुष्टि होती है, तो मामले में जिम्मेदारी तय करने की दिशा में आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
निर्माता से लेकर बैच नंबर तक खंगाले जा रहे रिकॉर्ड
विजिलेंस ब्यूरो ने जांच में उत्पाद के निर्माता, बैच नंबर, आपूर्ति के स्रोत, खरीद-बिक्री और वितरण नेटवर्क से संबंधित जानकारी जुटानी शुरू कर दी है।
जांच एजेंसी यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि उत्पाद की बिक्री और आपूर्ति के दौरान निर्धारित नियमों का पालन हुआ था या नहीं। इसके साथ ही सरकारी स्तर पर किसी अधिकारी या कर्मचारी की कथित मिलीभगत की संभावना को भी जांच के दायरे में रखा गया है।
DGP को पत्र के बाद सक्रिय हुआ विजिलेंस
बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार, विभाग ने मामले को लेकर डीजीपी को पत्र लिखा था। इसके बाद विजिलेंस ब्यूरो ने प्रारंभिक जांच शुरू करने की जानकारी विभाग को दी है।
उन्होंने बताया कि संबंधित उत्पाद के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। प्रयोगशाला रिपोर्ट आने के बाद ही उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता और उसमें मौजूद रसायनों की स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।
क्या होता है PGR?
PGR यानी Plant Growth Regulator ऐसे रसायन होते हैं, जिनका इस्तेमाल पौधों की वृद्धि और विकास को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। बागवानी में कुछ PGR का उपयोग फल के विकास, आकार और अन्य गुणों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
संबंधित उत्पाद में जिब्रेलिक एसिड और बेंजिलाडेनिन जैसे घटक होने का दावा किया गया है। कंपनी की ओर से भारत में केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति के तहत पंजीकरण होने का दावा भी किया गया है। हालांकि, मौजूदा मामले में उत्पाद की वास्तविक संरचना, गुणवत्ता और वैधता जांच का विषय है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी उठे सवाल
विशेषज्ञों के अनुसार किसी कृषि रसायन में गलत पदार्थ, अशुद्धियां या निर्धारित सीमा से अधिक सक्रिय रसायन पाए जाने पर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे उत्पादों के इस्तेमाल में किसानों और बागवानों के लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना बेहद जरूरी है।
हालांकि, संबंधित PGR से स्वास्थ्य पर वास्तविक प्रभाव पड़ा है या नहीं, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। इस संबंध में भी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले प्रयोगशाला और अन्य जांच रिपोर्ट का इंतजार जरूरी है।
अब रिपोर्ट पर टिकी नजर
फिलहाल विजिलेंस ब्यूरो की प्रारंभिक जांच और प्रयोगशाला रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि संबंधित PGR की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप थी या नहीं, उसमें किसी तरह की मिलावट हुई थी या नहीं और यदि अनियमितता पाई जाती है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
