घुमारवीं काॅलेज के विद्यार्थियों ने किया मत्स्य बीज फार्म दयोली (घाघस) का शैक्षणिक भ्रमण

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कार्प मत्स्य पालन की आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों की हासिल की विस्तृत जानकारी
एएम नाथ।  बिलासपुर, 30 अप्रैल: व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राजकीय महाविद्यालय घुमारवीं के एम.एस.सी. प्राणी विज्ञान (चतुर्थ सेमेस्टर) के 30 विद्यार्थियों ने मत्स्य बीज फार्म दयोली (घाघस) का शैक्षणिक भ्रमण किया।इस दौरान महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. कृष्ण लाल, प्रो. ज्योति भारद्वाज तथा डॉ. कमलेश कुमारी भी विद्यार्थियों के साथ उपस्थित रहे।
भ्रमण के दौरान मत्स्य बीज फार्म दयोली (घाघस) के मत्स्य अधिकारी हितेश कुमार ने विद्यार्थियों को कार्प मत्स्य पालन की आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों की विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने विद्यार्थियों को कार्प मत्स्य प्रजनन, बीज उत्पादन, तालाब प्रबंधन, आहार प्रबंधन तथा मछलियों में होने वाली बीमारियों एवं उनके उपचार के संबंध में विस्तार से अवगत करवाया।
उन्होंने बताया कि मत्स्य बीज फार्म दयोली (घाघस) की स्थापना वर्ष 1963 में की गई थी और यह प्रदेश के प्रमुख कार्प बीज उत्पादन केंद्रों में से एक है। लगभग 4.4 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले इस फार्म में 1.61 हेक्टेयर जल क्षेत्र शामिल है। यहां 14 नर्सरी तालाब, 12 रियरिंग तालाब तथा 3 ब्रूडर तालाब स्थापित हैं। फार्म में प्रतिवर्ष औसतन 8.50 लाख मछली अंगुलिकाओं, जिनमें कॉमन कार्प, हंगेरियन कार्प एवं भारतीय मेजर कार्प शामिल हैं, का उत्पादन किया जाता है। इसके अतिरिक्त यहां सजावटी मछलियों का उत्पादन भी किया जाता है।
इस अवसर पर विद्यार्थियों ने विशेष रुचि दिखाते हुए अधिकारियों के साथ संवाद स्थापित किया तथा मत्स्य पालन की वैज्ञानिक पद्धतियों का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया।
सहायक निदेशक मत्स्य, मंडल बिलासपुर पंकज ठाकुर ने बताया कि कोई भी शैक्षणिक संस्थान निदेशक एवं प्रारक्षी मत्स्य, हिमाचल प्रदेश से पूर्व अनुमति प्राप्त कर इस प्रकार के शैक्षणिक भ्रमण आयोजित कर सकता है। विभागीय अधिकारियों द्वारा विद्यार्थियों को पूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है, जिससे मत्स्य पालन के प्रति जागरूकता बढ़ती है।
निदेशक एवं प्रारक्षी मत्स्य, हिमाचल प्रदेश विवेक चंदेल ने कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इससे उन्हें सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर का अनुभव प्राप्त होता है तथा वे भविष्य में मत्स्य पालन के क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।

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