डॉ. गिरधारी लाल कश्यप। बद्दी : जिला स्तरीय दो दिवसीय जय मां चंडी मेले का आयोजन 29 और 30 मई को मेला ग्राउंड चंडी में धूमधाम से किया जाएगा।पूर्व पंचायत प्रधान बलवंत ठाकुर व अध्यक्ष मंदिर कमेटी चंद्र मोहन शर्मा ने बताया कि मेले का शुभारंभ 29 मई को मां चंडी देवी की पूजा अर्चना के साथ विधायक राम कुमार चौधरी द्वारा किया जाएगा।उन्होंने बताया कि मेले में कबड्डी जूनियर व सीनियर वर्ग, दंगल, शतरंज व चैस की प्रतियोगिताएं करवाई जाएंगी। इसके इलावा लोकसंपर्क विभाग व अन्य कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे।मेले में सभी भक्तों के लिए लंगर की सुविधा भी होगी। मेले के पहले दिन शाम को जागरण में पूर्व विधायक परमजीत सिंह पम्मी बतौर मुख्यातिथि शिरकत करेंगे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान शिव शक्ति का क्षत-विक्षत शव अपने कंधे पर उठाकर के कैलाश जा रहे थे, तो जहां जहां सती के अंग गिरे वहां वहां वर्तमान में शक्ति स्थल बन गए, कुछ स्थल प्रसिद्ध हो गए, कुछ अभी विश्व के मानचित्र पर उभरने बाकी है। ऐसा ही उभरता हुआ शक्ति स्थल जय माँ चंडी देवी का मंदिर है।
माँ चंडी का यह मंदिर विकास खंड पट्टा मेहलोग की ग्राम पंचायत चंडी में स्थित है।
गांव के चारों ओर से पर्वतीय शैल मालाओं की हरी भरी घाटियों एवं उत्तंग शिखरो से घिरा हुआ चंडी गांव अपने आप में रमणीय रूप से वर्तमान मे धार्मिक आस्था का केंद्र बन गया है। चंडी मंदिर विकास समिति की उचित देखरेख में विकास एवं आस्था के नए मील के पत्थर स्थापित कर रहा है।
बता दें कि चंडी गांव का नामकरण भी माँ चंडी देवी के नाम से हुआ है। पौराणिक मिथकों के आधार पर माँ चंडी इस गांव में पिंडी रूप में प्रकट हुई थी,कहते हैं कि एक स्थानीय किसान जब अपने खेत में हल जोत रहा था तो उस दौरान हल की फाली के अगले भाग में खून लगा देख कर के वह किसान बहुत अचंभित एवं भयभीत हो गया कि मेरे हल के नुकीले भाग अर्थात फाली से क्या जीव मर गया होगा जो यह खून लगा है। जब वह इस दृश्य को देख कर के बहुत भयभीत एवं आश्चर्यचकित हुआ तो उसने अपनी नजर इधर उधर खेत में घूमाई तो उसने पाया कि यह खून एक पत्थर नुमा पिंडी के ऊपरी हिस्से से बह रहा है। इस दैविक दृश्य को देख कर के वह किसान बहुत आश्चर्यचकित एवं अचंभित रह गया।
उसके उपरांत उस किसान ने अपने घर के सदस्यों एवं स्थानीय गांव के लोगों के साथ इस दैविक घटना के विषय पर चर्चा की। इस देविक घटना के उपरांत एक रात को उस किसान को स्वपन में माँ काली अर्थात चंडी का साक्षात्कार हुआ। माँ चंडी ने उस किसान से स्वपन में कहा कि मुझे पिंडी रूप में अपने गांव में स्थापित कर नित्य प्रति इस की पूजा करें । इससे उसका एवं सारे चंडी क्षेत्र का भविष्य में कल्याण होगा। इस के बाद गांव के लोगों ने माँ चंडी को प्रति स्वरूप उस पत्थर नुमा पिंडी को चौकी बना करके उस पर विधिवत पूजन एवं मंत्रोच्चारण के साथ उसको स्थापित किया। यदि हम इतिहास के पन्ने को खोल कर देखें तो पाते हैं की माँ चंडी देवी का मंदिर पट्टा महलोग रियासत के तत्कालिक मैनेजर मियां भवानी सिंह ने मां चंडी के प्रति अपनी पूर्ण आस्था एवं अटूट श्रद्धा के चलते सन 1910 में इस की स्थापना की थी।आज माँ चंडी देवी उभरता हुआ धार्मिक एवं निष्ठा का केंद्र बन गया है।इस मंदिर की पवित्रता और धार्मिक निष्ठा के चलते इस मंदिर का और भी महत्व बढ़ जाता है। यह पवित्र एवं धार्मिक स्थल सोलन से 45 सुबाथू से 21 , कुनिहार से 18, हरिपुर गुरुद्वारे से केवल 12 व नालागढ़ से 40 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। वैसे हिमाचल के सभी शक्ति स्थल पर वर्ष भर मेले लगते हैं लेकिन चंडी मेले की अपनी विशेष महत्ता है। यह मेला आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ा मेला है। स्थानीय लोग उत्सुकता एवं बेसब्री से इस मेले का वर्ष भर इंतजार करते हैं ।इसे चंडी की जातर के नाम से भी जाना जाता है।यह मेला पिछले 100 वर्षों से लगता आ रहा है
