जोगिन्द्रा बैंक सोलन में करोड़ों के घोटाले के आरोप, ऑडिट रिपोर्ट में हेरफेर का दावा

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₹68 करोड़ की लिक्विड संपत्तियां छिपाने और सब्सिडी हड़पने के आरोप, बैंक प्रबंधन कटघरे में

अधिवक्ता मुकेश शर्मा की शिकायत से मचा हड़कंप, उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज

एएम नाथ। सोलन : सोलन स्थित जोगिन्द्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक एक बार फिर गंभीर आरोपों के चलते विवादों में आ गया है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों पर करोड़ों रुपये के वित्तीय घोटाले, सरकारी सब्सिडी के दुरुपयोग और ऑडिट रिपोर्ट में कथित हेरफेर के आरोप लगाए हैं। उन्होंने इस संबंध में नाबार्ड के मुख्य सतर्कता अधिकारी को विस्तृत शिकायत भेजकर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
शिकायत के अनुसार वर्ष 2019 में एमएमएसवाई योजना के तहत रजत गुप्ता के नाम पर करीब ₹39.5 लाख का ऋण स्वीकृत किया गया, जिसमें लगभग ₹9.87 लाख की सब्सिडी शामिल थी। आरोप है कि इस ऋण स्वीकृति में बैंकिंग नियमों की अनदेखी की गई और अधिकारियों की मिलीभगत से प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। इसके बाद एक और मामले में नीतू देवी के नाम पर ₹40 लाख का ऋण, जिसमें ₹12 लाख की सब्सिडी शामिल थी, स्वीकृत कर दिया गया, जबकि उनके नाम पर कोई संपत्ति नहीं थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि यह पूरा प्रकरण एक सुनियोजित साजिश के तहत अंजाम दिया गया।
मामले को और गंभीर बनाते हुए शर्मा ने आरोप लगाया कि वर्ष 2020-21 में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की ऑडिट जांच में इन ऋणों में अनियमितताएं पाई गई थीं, लेकिन बाद में 2021 में एक नई रिपोर्ट तैयार कर पूरे मामले को क्लीन चिट दे दी गई। इस रिपोर्ट को तत्कालीन प्रबंध निदेशक से अनुमोदित कर नियामक संस्थाओं को यह जानकारी दी गई कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुसार पूरी हुई हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार यह नियामक संस्थाओं को गुमराह करने का प्रयास है।
सबसे अहम आरोप लगभग ₹22 लाख की सब्सिडी राशि को लेकर है, जिसे लॉक-इन अवधि समाप्त होने के बाद भी न तो संबंधित विभाग को लौटाया गया और न ही लाभार्थियों से वसूला गया। शर्मा का कहना है कि यह सीधे तौर पर सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला है।
इसके अलावा, वर्ष 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट में करीब ₹68 करोड़ की अतिरिक्त लिक्विड संपत्तियों को छिपाने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायत के अनुसार इन फंड्स को नियमानुसार निवेश नहीं किया गया, जिससे बैंक को लगभग ₹15 करोड़ के ब्याज का नुकसान हुआ। आरोप यह भी है कि बाद में पूरक ऑडिट रिपोर्ट में तथ्यों को बदलकर यह दर्शाया गया कि राशि कॉल मनी मार्केट में निवेश की गई थी, जबकि इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया।
शर्मा ने दावा किया है कि उन्होंने इस मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उन्हें अस्पष्ट जवाब मिला। उन्होंने आरसीएस, नाबार्ड और अन्य एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
अधिवक्ता ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और सरकारी धन की भरपाई की मांग की है, ताकि जनता का विश्वास बहाल हो सके।

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