टांकरी लिपि के पुनर्जीवन हेतु ऐतिहासिक पहल : स्वदेशी ज्ञान परंपराओं के संरक्षण के लिए दो संस्थानों में समझौता

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हिमाचल की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की दिशा में बड़ा कदम

एएम नाथ। सलूणी :  राजकीय महाविद्यालय सलूणी और हिम संस्कृति शोध संस्थान के बीच सोमवार को एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता वर्चुअल माध्यम से संपन्न हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर, विशेष रूप से विलुप्तप्राय टांकरी लिपि और क्षेत्रीय बोलियों का पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रसार करना है।
यह पहल राज्य की स्वदेशी ज्ञान परंपराओं को संरक्षित करने की दिशा में एक ठोस प्रयास मानी जा रही है। इस सहयोग के माध्यम से दोनों संस्थान मिलकर न केवल टांकरी लिपि को पुनर्जीवित करेंगे, बल्कि उसे शैक्षणिक और शोध गतिविधियों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य भी करेंगे।
समझौते के अंतर्गत विभिन्न शैक्षणिक और प्रशिक्षण गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा, जिनमें कार्यशालाएं, प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम, सेमिनार और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से छात्र और शोधार्थी टांकरी लिपि को सीख सकेंगे और उससे जुड़ी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझ पाएंगे। यह पहल विशेष रूप से भाषाविज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययन के विद्यार्थियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।
इसके अतिरिक्त, इस साझेदारी में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, प्राचीन पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण, पारंपरिक अभिलेखों का डिजिटलीकरण और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी शामिल किए गए हैं। इससे न केवल अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित होगी, बल्कि शोध के नए आयाम भी खुलेंगे।
दोनों संस्थानों के प्रतिनिधियों ने इस अवसर पर कहा कि यह समझौता क्षेत्रीय संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को संरक्षित करने की दिशा में एक सार्थक और दूरगामी पहल है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह सहयोग भविष्य में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाएगा और अधिक से अधिक लोगों को इस मिशन से जोड़ेगा।
यह MoU तीन वर्षों की अवधि के लिए प्रभावी रहेगा, जिसे आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी के लिए एक संयुक्त समन्वय समिति का गठन किया जाएगा, जो विभिन्न गतिविधियों की प्रगति पर नजर रखेगी।
कुल मिलाकर, यह समझौता हिमाचल प्रदेश की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह पहल न केवल अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण को बढ़ावा देगी, बल्कि शैक्षणिक और शोध संस्थानों की भूमिका को भी और अधिक सशक्त बनाएगी।

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