चंडीगढ़ : महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में लगातार हो रही देरी को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय अहम बदलाव की तैयारी कर रहा है। मंत्रालय अब पुलिस अधिकारियों की परफार्मेंस रिपोर्ट को दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों की समय पर जांच और चार्जशीट दाखिल करने से जोड़ने पर विचार कर रहा है।
इस प्रस्ताव को लेकर गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से चर्चा भी शुरू कर दी है।
पंजाब पुलिस के अधिकारियों के मुताबिक गृह मंत्रालय चाहता है कि पुलिस अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) व वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (एपीएआर) में यह स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए कि संबंधित अधिकारी ने महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन अपराधों की जांच तय समय सीमा के भीतर पूरी की या नहीं। किसी अधिकारी के कार्यकाल में ऐसे मामलों में लगातार देरी पाई जाती है, तो इसका सीधा असर उसकी प्रमोशन, पोस्टिंग और सर्विस रिकॉर्ड पर पड़ सकता है।
सूत्रों का कहना है कि गृह मंत्रालय इस प्रस्ताव को जल्द ही औपचारिक दिशा-निर्देश के रूप में जारी कर सकता है, जिसके बाद सभी राज्यों को इसे अपनी पुलिस सेवा नियमावली में लागू करना होगा। यह बदलाव महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से निपटने के लिए अब तक का सबसे सख्त प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। फिलहाल कानून में समयसीमा तय होने के बावजूद जमीनी स्तर पर जवाबदेही की काफी कमी है। कई मामलों में जांच महीनों और कई बार वर्षों तक लटक जाती है, जिससे पीड़ितों को न्याय मिलने में काफी देरी होती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत दुष्कर्म और पाक्सो से जुड़े मामलों में जांच पूरी करने और चार्जशीट दाखिल करने की समयसीमा 60 दिन निर्धारित की गई है। इसके बावजूद मंत्रालय को मिली रिपोर्टों के मुताबिक कई राज्यों में इस समयसीमा का पालन नहीं किया जा रहा है।
पंजाब में 2,000 मामले लंबित
आंकड़ों के मुताबिक देशभर में औसतन सिर्फ 56 प्रतिशत जांच ही तय समय सीमा के भीतर पूरी हो पा रही है। पंजाब में करीब 2,000 मामले फोरेंसिक रिपोर्ट के इंतजार में लंबित हैं। मंत्रालय का मानना है कि अगर इसे अधिकारियों की परफार्मेंस से जोड़ दिया गया तो जवाबदेही बढ़ेगी।
फोरेंसिक जांच में देरी गृह मंत्रालय की चिंता
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि गृह मंत्रालय की चिंता का सबसे बड़ा कारण फोरेंसिक जांच में हो रही देरी है। कई मामलों में डीएनए, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य वैज्ञानिक सुबूत समय पर नहीं मिल पाते, जिससे पुलिस चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती।
इसी वजह से मंत्रालय अब यह भी देख रहा है कि केंद्रीय फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (सीएफएसएल) और नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी (एनएफएसयू) किस तरह राज्यों को तकनीकी और संसाधन स्तर पर मदद दे सकती हैं। गृह मंत्रालय ने राज्यों से यह भी कहा है कि वे अपने-अपने स्तर पर फोरेंसिक लैब की क्षमता बढ़ाएं, स्टाफ की भर्ती करें और डिजिटल सिस्टम को मजबूत बनाएं, ताकि जांच प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो।
