धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा : भाजपा दुआरा क्या बड़े राजनीतिक लक्ष्यों के लिए दी गई एक ‘सोची-समझी’ बलि?

by

नई दिल्ली :  केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का हालिया इस्तीफा भी भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में एक ऐसा ही मोड़ बनकर उभरा है। नीट पेपर लीक और सीबीएसई मार्किंग विवाद के बाद 36 दिनों से जंतर-मंतर पर डटे छात्रों के आगे भले ही सरकार झुकती हुई दिखी हो, लेकिन सत्ता के गलियारों में चर्चा कुछ और ही है। सवाल उठ रहा है कि क्या प्रधान का इस्तीफा वाकई छात्र आंदोलन का दबाव था, या फिर बीजेपी ने अपने किसी बहुत बड़े और गुप्त एजेंडे को अमलीजामा पहनाने के लिए यह रणनीतिक ‘बलि’ दी है?

NEET विवाद से शुरू हुआ संकट कैसे बन गया सरकार की सबसे बड़ी चुनौती?

NEET-UG पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली को लेकर उठे सवालों ने छात्रों के असंतोष को लगातार बढ़ाया। समय बीतने के साथ आंदोलन सिर्फ परीक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जवाबदेही, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों की चर्चा का विषय बन गया। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन तेज होते गए। आंदोलन का दायरा बढ़ने के साथ राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ी और मामला संसद तक पहुंच गया। इसी दौरान सरकार पर कार्रवाई की मांग तेज होती गई।

‘जेंगा’ की तरह ढहती व्यवस्था: जब जिद पर अड़ गया था आलाकमान

जब देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था ताश के पत्तों या ‘जेंगा’ (Jenga) के ब्लॉकों की तरह ढहती दिख रही थी, तब शुरुआत में सरकार ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी थी। बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी कभी भी दबाव में झुककर कोई ऐसी ‘मिसाल’ कायम नहीं करना चाहती, जिससे भविष्य में हर आंदोलन के आगे मंत्रियों के इस्तीफे होने लगें। यही वजह थी कि जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले जब सौरव दास और आशुतोष रंका जैसे युवा नेताओं ने मोर्चा खोला, तो पहले इसे नजरअंदाज किया गया। लेकिन जब 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) का कड़ा बल प्रयोग हुआ, तो हवा का रुख बदल गया और सरकार बैकफुट पर आ गई।

मॉनसून सत्र का गतिरोध: जब दांव पर लगी थी सरकार की साख

20 जुलाई से शुरू हुआ संसद का मॉनसून सत्र सरकार के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। विपक्ष के नेता राहुल गांधी की अगुवाई में पूरा विपक्ष संसद को ठप करने पर आमादा था। पहला हफ्ता हंगामे की भेंट चढ़ चुका था। एक तरफ वरिष्ठ मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की जोड़ी नए-नवेले छात्र नेताओं से बंद कमरों में बातचीत करने को मजबूर थी, वहीं दूसरी तरफ संसद ठप होने से सरकार का वह गुप्त संसदीय एजेंडा खटाई में पड़ता दिख रहा था, जिसके लिए उसने महीनों पर्दे के पीछे कड़ी मेहनत की थी।

दिलों का खेल या नंबर गेम? पर्दे के पीछे की वो बड़ी योजना

बीजेपी सिर्फ आज की नहीं, बल्कि कल की सोचती है। राजनीतिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस मॉनसून सत्र में सरकार बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील ‘परिसीमन विधेयक’ (Delimitation Bill) पेश करने की तैयारी में है। यह वही बिल है जो अप्रैल के विशेष सत्र में दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया था-जो मोदी सरकार के इतिहास में पहली बार किसी संवैधानिक संशोधन बिल का गिरना था। लेकिन अप्रैल से लेकर जुलाई 2026 के बीच बीजेपी ने बड़ी ही खामोशी से संसद का गणित बदल दिया। हालिया दलबदलों के बाद, लोकसभा में एनडीए की संख्या 293 से बढ़कर 318 हो गई है (जिसमें तृणमूल के 20 बागी और शिवसेना UBT के 6 सांसद शामिल हैं)। वहीं राज्यसभा में भी एनडीए की ताकत 101 से छलांग लगाकर 152 तक पहुंच चुकी है। शरद पवार और एम.के. स्टालिन जैसे कद्दावर क्षत्रपों को साधने के बाद, सरकार इस बार परिसीमन बिल को हर हाल में पास कराना चाहती थी।

क्या देरी ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दीं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुरुआती दौर में सरकार ने हालात सामान्य होने की उम्मीद की। लेकिन जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने, सरकार पर दबाव भी बढ़ता गया। कई पर्यवेक्षकों का तर्क है कि यदि शुरुआत में कोई बड़ा प्रशासनिक या राजनीतिक फैसला लिया जाता, तो विवाद इतना व्यापक रूप नहीं लेता। हालांकि सरकार की ओर से इस तरह की किसी रणनीति की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

नीत्शे का ‘ईगो’ और रणनीतिक कदम: क्यों सही वक्त का इंतजार किया?

संसद में जब इतना कुछ दांव पर लगा हो, तो किसी एक मंत्री की प्रतिष्ठा से ज्यादा पार्टी के ‘सभ्यतागत लक्ष्य’ मायने रखते हैं। जैसे सरकार ने साल भर चले किसान आंदोलन के बाद तीन कृषि कानूनों को वापस लेकर रणनीतिक कदम उठाया था, ठीक वैसे ही यहां भी किया गया। बीजेपी जानती थी कि जब तक जंतर-मंतर की आग ठंडी नहीं होगी, कांग्रेस और विपक्ष संसद में परिसीमन जैसे बड़े ऐतिहासिक बिल पर चर्चा नहीं होने देंगे। इसलिए, प्रतिष्ठा और बड़े लक्ष्यों की इस जंग में सरकार ने अपने कदम पीछे खींचना ही बेहतर समझा। धर्मेंद्र प्रधान को उस व्यवस्था का चेहरा बनाकर बलि का बकरा बना दिया गया, ताकि संसद का रास्ता साफ हो सके। हालांकि, इतिहास में यह सवाल हमेशा गूंजता रहेगा कि जो फैसला आखिरी समय पर लिया गया, वह दूरदर्शी रणनीति थी या नीत्शे के उस ‘अहंकार’ (Ego) को छोड़ने में हुई देरी, जिसने सरकार को कुछ समय के लिए अड़ियल साबित कर दिया था।

क्या इस्तीफा राजनीतिक नुकसान सीमित करने की कोशिश था?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, किसी भी सरकार के लिए लंबे समय तक जारी जनआंदोलन राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकते हैं। ऐसे में कभी-कभी नेतृत्व विवाद को सीमित करने के लिए बड़े फैसले लेता है। इसी संदर्भ में कुछ विश्लेषक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को “डैमेज कंट्रोल” की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। दूसरी ओर, कई विशेषज्ञ इसे केवल बढ़ते जनदबाव के बीच लिया गया प्रशासनिक निर्णय मानते हैं।

क्या अब सरकार बड़े विधायी एजेंडे पर पूरा ध्यान दे पाएगी?

इस्तीफे के बाद राजनीतिक चर्चा का केंद्र अब संसद का आगामी एजेंडा बन गया है। यह देखा जाएगा कि क्या सरकार अब बिना लगातार व्यवधान के अपने विधायी कार्यक्रम को आगे बढ़ा पाती है या विपक्ष नए मुद्दों के साथ सरकार को घेरने की कोशिश जारी रखेगा। राजनीतिक समीकरणों में हुए हालिया बदलावों के बीच संसद का यह सत्र सरकार और विपक्ष-दोनों के लिए अहम माना जा रहा है।

 

Share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

You may also like

article-image
पंजाब

सरपंच यूनियन ब्लॉक गढ़शंकर : सर्बसमिती से सोनी को अध्यक्ष और जतिन्द्र ज्योति व सरपंच बलदीप सिंह को उपाध्यक्ष चुना

गढ़शंकर।  सरपंच यूनियन ब्लॉक गढ़शंकर की मीटिंग में सर्बसमिती हुए चुनाव में 21 सदस्यीय कमेटी का चुनाव हुया। जिसमे कुनैल के सरपंच विनोद कुमार सोनी को अध्यक्ष और बस्ती सेंसिया के सरपंच जतिन्द्र ज्योति ब...
article-image
पंजाब

Cancer Awareness Camp in Bhugarni

Hoshiarpur/Daljeet Ajnoha/Dec.27 : An early cancer detection and eye check-up medical camp, organised by M/S World Cancer Care (a UK-based charitable society) and sponsored by M/S Vardhman Threads Limited, Ludhiana/Hoshiarpur, concluded successfully in Bhugarni...
article-image
पंजाब

Extend College Hours to 7 for

Hoshiarpur/Daljeet Ajnoha/ August 03 : Anil Kumar, Associate Professor in the Department of History at DAV College Hoshiarpur, has advocated for a significant academic reform across colleges in Punjab. Emphasizing the need for extended...
article-image
पंजाब , समाचार

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पंजाब में 13 करोड़ के नए प्रोजेक्ट आम जनता को किए समर्पित : पंजाब में जमीन की रजिस्ट्री कराना हुआ आसान, 15 दिनों में बदल जाएगा तहसीलों का सिस्टम

लुधियाना ।  पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने बुधवार को कहा कि राज्य सरकार ने पंजाब को तेज आर्थिक विकास के पथ पर लाने के लिए कई जन-समर्थक और विकास-उन्मुख नीतियां शुरू करके...
Translate »
error: Content is protected !!