रोहित जसवाल : होशियारपुर : नॉन-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (एनएसएचएच) फैटी लिवर रोग का एक उन्नत और संभावित रूप से जानलेवा रूप है, जो भारत में तेजी से एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रहा है। ख़राब जीवनशैली और मेटाबॉलिक विकार वाले व्यक्तियों में विशेष रूप से इसके मामलों की संख्या बढ़ रही है।
लिवासा अस्पताल, होशियारपुर के गैस्ट्रो एवं लिवर स्पेशलिस्ट, डॉ मुकेश कुमार ने कहा, एनएसएचएच अक्सर एक मूक बीमारी है जो बिना किसी लक्षण के बढ़ती रहती है। जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक लिवर को काफी नुकसान हो चुका होता है। सिरोसिस या लिवर फेलियर जैसी अपरिवर्तनीय जटिलताओं को रोकने के लिए प्रारंभिक जांच और समय पर जीवनशैली में बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
एनएसएचएच, फैटी लिवर डिजीज की एक उन्नत अवस्था है, जिसमें लिवर में फैट एकम्यूलेशन, सूजन और लीवर कोशिकाओं को नुकसान होता है। यदि इसका इलाज न किया जाए, तो यह फाइब्रोसिस सिरोसिस और लिवर फेलियर में परिवर्तित हो सकता है।
डॉ कुमार ने बताया कि एनएसएचएच की बढ़ती घटनाएं मोटापे और अधिक वजन, टाइप 2 मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स, ख़राब जीवनशैली, इंसुलिन रेजिस्टेंस और खराब खान-पान की आदतों से निकटता से जुड़ी हुई हैं।
डॉ कुमार ने कहा, एनएसएचएच अक्सर शुरुआती चरणों में लक्षणहीन रहता है। जैसे-जैसे यह बढ़ता है, मरीजों को थकान, पेट में तकलीफ, कमजोरी और वजन कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर मामलों में पीलिया, पेट में सूजन, एनीमिया और प्लेटलेट्स की कमी हो सकती है। इलाज़ में रक्त परीक्षण, इमेजिंग (अल्ट्रासाउंड, फाइब्रोस्कैन) और कुछ मामलों में एमआरआई/ सीटी या लिवर बायोप्सी शामिल हैं।
उपचार और रोकथाम के बारे में बात करते हुए, डॉ कुमार ने कहा कि हालांकि कोई एक स्वीकृत दवा मौजूद नहीं है, एनएसएचएच को वजन कम करके (7-10 फीसदी) स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम और मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करके नियंत्रित किया जा सकता है।
