फ्रांस में स्कूलों की बदहाली से सुलगा देश, छात्र आंदोलन ने सरकार की बढ़ाई मुश्किलें
फ्रांस | 18 अक्टूबर । शिक्षकों की कमी, जर्जर स्कूल भवन और महंगाई के खिलाफ सड़कों पर उतरे छात्र; पुलिस कार्रवाई में 15 वर्षीय किशोर का हाथ कटने से भड़का आक्रोश, हजारों गिरफ्तारियां और हिंसक झड़पें बनीं बड़ी चुनौती
फ्रांस में स्कूलों की बदहाल व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब शिक्षा सुधार की मांग से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का रूप ले चुका है। शिक्षकों की कमी, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं और जर्जर स्कूल भवनों से नाराज विद्यार्थियों के साथ शिक्षक, अभिभावक और श्रमिक संगठनों के जुड़ने से आंदोलन का दायरा बढ़ा है। महंगाई, वेतन, पेंशन और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए हैं।
अक्टूबर के पहले सप्ताह में पुलिस कार्रवाई के दौरान कई किशोरों के गंभीर रूप से घायल होने की खबरों ने आंदोलन को नया मोड़ दिया। उत्तरी फ्रांस के लेंस शहर में 5 अक्टूबर को एक 15 वर्षीय छात्र का पुलिस की भीड़ नियंत्रित करने वाली ग्रेनेड से हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ, जिसके बाद उसे काटना पड़ा। इस घटना ने पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के साथ किए जा रहे व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
हालांकि, आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और पुलिसकर्मियों पर हमलों ने भी स्थिति को गंभीर बनाया है। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर छात्रों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना और दूसरी ओर हिंसक घटनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कानून-व्यवस्था बनाए रखना।
### क्रेतै के स्कूल से शुरू हुई चिंगारी, देशभर में फैला विरोध
आंदोलन की शुरुआत सितंबर के दूसरे पखवाड़े में पेरिस के उपनगर क्रेतै स्थित एंटोनी डी सेंट-एक्जुपेरी हाईस्कूल से हुई। यहां शिक्षकों के रिक्त पदों और पर्याप्त संसाधनों की कमी को लेकर असंतोष सामने आया। छात्रों ने शिक्षकों की मांगों का समर्थन करते हुए स्कूलों में विरोध प्रदर्शन और अवरोध शुरू किए।
शुरुआती दिनों में यह आंदोलन पेरिस के आसपास के स्कूलों तक सीमित था, लेकिन जल्द ही दूसरे शहरों में भी प्रदर्शन शुरू हो गए। 2 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, एक दिन में देशभर के 1,000 से अधिक स्कूलों में आंदोलन का असर दिखाई दिया। इससे स्पष्ट हो गया कि छात्रों की शिकायतें किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं थीं।
छात्रों का कहना है कि स्कूलों में शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की कमी के कारण पढ़ाई प्रभावित होती है। कई जगह कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या अधिक है, जबकि भवनों की मरम्मत और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर भी शिकायतें हैं। भीषण गर्मी में पढ़ाई, लंबी समय-सारिणी और विश्वविद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया से जुड़ा तनाव भी असंतोष के प्रमुख कारणों में शामिल बताया गया है।
### 15 वर्षीय छात्र का हाथ कटने से पुलिस कार्रवाई पर सवाल
आंदोलन के दौरान सबसे गंभीर घटनाओं में से एक 5 अक्टूबर को उत्तरी फ्रांस के लेंस शहर में हुई। स्कूल के बाहर प्रदर्शन के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच तनाव बढ़ गया। इसी दौरान 15 वर्षीय एक छात्र का हाथ विस्फोटक भीड़-नियंत्रण उपकरण से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और बाद में उसे काटना पड़ा।
घटना की परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। अधिकारियों के अनुसार, पुलिस प्रदर्शनकारियों द्वारा वस्तुएं फेंके जाने और आगजनी की घटनाओं के बीच भीड़ को हटाने के लिए कार्रवाई कर रही थी। वहीं, छात्रों और प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस की कार्रवाई की तीव्रता पर सवाल उठाए।
मामले की जांच फ्रांस की पुलिस निगरानी संस्था आईजीपीएन को सौंपी गई, ताकि यह पता लगाया जा सके कि घटना किन परिस्थितियों में हुई और पुलिस की कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
इस घटना ने छात्रों के बीच भय और आक्रोश दोनों बढ़ाए। प्रदर्शनकारियों के समर्थन में अधिक लोग सामने आने लगे और पुलिस की जवाबदेही आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बन गई।
### हजारों गिरफ्तारियां, नाबालिगों की बड़ी संख्या
फ्रांस में सितंबर के अंत से अक्टूबर के शुरुआती दिनों तक पुलिस ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं। ले मोंद की 8 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, 28 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच 6,059 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से 5,060 लोगों को पुलिस हिरासत में लिया गया और न्याय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, हिरासत में लिए गए लोगों में 87 प्रतिशत नाबालिग थे।
गिरफ्तारियों के साथ-साथ छात्रों के घायल होने की घटनाओं ने पुलिस की रणनीति पर बहस तेज कर दी। दूसरी ओर, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कुछ समूहों ने प्रदर्शन की आड़ में हिंसा, तोड़फोड़ और पुलिस पर हमले किए।
इस तरह आंदोलन के दो पहलू सामने आए हैं। एक ओर स्कूलों में सुधार की मांग कर रहे छात्र हैं, तो दूसरी ओर हिंसक घटनाओं को नियंत्रित करने में जुटी पुलिस। इन दोनों के बीच तनाव कम करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
### 17 अक्टूबर को देशव्यापी प्रदर्शन, कई शहरों में आगजनी
शनिवार, 17 अक्टूबर को आंदोलन ने नया और गंभीर रूप ले लिया। स्कूलों की समस्याओं के साथ महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर नाराज लोग भी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे।
फ्रांस के गृह मंत्रालय ने प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग 5.5 लाख बताई, जबकि आयोजकों ने करीब 8 लाख लोगों के शामिल होने का दावा किया। शुरुआती सरकारी आंकड़ों में लगभग 400 लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी गई थी। रविवार को सामने आई बाद की रिपोर्टों में गिरफ्तारियों की संख्या लगभग 1,800 तक पहुंचने की बात कही गई। इसलिए इन आंकड़ों को अलग-अलग समय पर जारी किए गए आंकड़ों के रूप में देखना जरूरी है।
अधिकांश लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से मार्च किया, लेकिन कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए। पेरिस में दुकानों में लूटपाट और वाहनों में आग लगाने की घटनाएं सामने आईं। मार्सिले में प्रदर्शनकारियों ने नगर प्रशासन की इमारत में प्रवेश किया, जबकि लिली और अन्य शहरों में भी सार्वजनिक इमारतों को निशाना बनाए जाने की खबरें आईं।
लिमोज में ऐतिहासिक नगर भवन में आग लगने से भारी नुकसान हुआ। स्थानीय प्रशासन के अनुसार, इमारत का बड़ा हिस्सा आग से प्रभावित हुआ और उसकी छत ढह गई। लियोन में पर्यटन कार्यालय को भी आग के कारण नुकसान पहुंचा।
### महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली भी बना बड़ा मुद्दा
आंदोलन के व्यापक होने के पीछे केवल शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं ही नहीं हैं। बढ़ती कीमतों, वेतन और पेंशन को लेकर असंतोष भी लोगों को प्रदर्शन में शामिल कर रहा है।
श्रमिक संगठनों ने बेहतर वेतन, पेंशन में सुधार, महंगाई पर नियंत्रण और सार्वजनिक सेवाओं की सुरक्षा की मांगों को समर्थन दिया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि जब जीवनयापन की लागत बढ़ती जा रही हो और सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हों, तो आम परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों की शिकायतों ने इन व्यापक आर्थिक चिंताओं को एक साझा मंच प्रदान किया। इसीलिए आंदोलन अब केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों की नाराजगी का माध्यम बन गया है।
### मैक्रों सरकार के सामने दोहरी चुनौती
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार बना रहेगा, लेकिन लूटपाट, आगजनी और सार्वजनिक संस्थानों पर हमलों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने भी हिंसा की निंदा की है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों के बीच आंदोलन को लेकर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। कुछ नेता छात्रों की मांगों और पुलिस कार्रवाई की आलोचना को समर्थन दे रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि हिंसक समूहों ने वास्तविक मुद्दों को पीछे धकेल दिया है।
सरकार के लिए चुनौती इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि केवल पुलिस कार्रवाई से शिक्षकों की कमी, स्कूलों के रखरखाव और आर्थिक असंतोष जैसी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। वहीं, हिंसा पर नियंत्रण के बिना स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों का सामान्य संचालन भी कठिन बना रहेगा।
### क्या आंदोलन थमेगा या और व्यापक होगा?
फ्रांस की मौजूदा स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार छात्रों और शिक्षकों की मांगों पर कितना ठोस कदम उठाती है, पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों की जांच कितनी निष्पक्ष होती है और महंगाई तथा सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर क्या समाधान निकाला जाता है।
यदि शिक्षा व्यवस्था में सुधार, कर्मचारियों की उपलब्धता और स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर ठोस निर्णय लिए जाते हैं, तो आंदोलन की तीव्रता कम हो सकती है। लेकिन यदि लोगों को लगता है कि उनकी शिकायतों को नजरअंदाज किया जा रहा है, तो असंतोष आगे भी बना रह सकता है।
फ्रांस में जारी संकट का मूल सवाल यही है कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ उन समस्याओं का समाधान कैसे करेगी, जिनके कारण छात्र सड़कों पर उतरे। हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था और आम नागरिकों की आर्थिक परेशानियों को दूर करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
