ओवरलोडेड सिस्टम से डॉक्टरों का मनोबल और टूटेगा और मरीजों की मुसीबत बढ़ेगी
एएम नाथ। शिमला : .आईजीएमसी शिमला में हुआ झगड़ा कोई सामान्य मामला नहीं बल्कि यह सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की घोर नाकामी का करारा सबूत है। ये बात विधायक डॉ. जनक राज ने कही। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार की व्यवस्था परिवर्तन, खोखले दावों वाली स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और सरकार की नाकामी का जीता-जागता प्रमाण है।
डॉ. जनक राज ने कहा कि क्या मरीज़ अपराधी हैं। क्या अस्पताल प्रताड़ना केन्द्र बन गए हैं। एक बेड पर दो तीन मरीज, जाँच और ऑपरेशन के लिए लम्बा इंतज़ार, क्या डाक्टर और मरीज एक दूसरे के दुश्मन हैं ?
उन्होंने कहा कि सरकार ने प्रदेश के अस्पतालों को अव्यवस्था का अड्डा बना दिया है। प्रदेश के सभी अस्पतालों में स्टाफ की भारी कमी, घंटों इंतजार, सुरक्षा का अभाव व शिकायत निवारण की कोई व्यवस्था नहीं है। यह सब सरकार की नीतिगत विफलता का सीधा परिणाम है। अस्पतालों में डॉक्टर और मरीज दोनों पीड़ित हैं। इसका केवल एक ही कारण है सरकार की लापरवाही। डॉ. जनक ने कहा कि हमने सदन में भी पूछा था सरकार ने अस्पतालों की व्यवस्था सुधारने और स्टाफ की कमी को पूरा करने की बजाए 180 करोड़ के छह रोबोट खरीदना जरूरी क्यों समझा ?
क्या यह फैसला लोगों की माँग और उनकी ज़रूरतों के आधार पर लिया गया था? क्योंकि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार लोगों के हितों के लिए काम करती है संविधान में ऐसा लिखा है।
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एक डॉक्टर और एक अच्छे डॉक्टर में ज़मीन-आसमान का फ़र्क : डॉ. जनक राज
विधायक डॉ. जनक राज का कहना है कि चिकित्सक होने के नाते मेरे अनुभव जो एक डॉक्टर और एक अच्छे डॉक्टर में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है। एक डॉक्टर केवल बीमारी देखता है। वह डायग्नोसिस करता है, दवा लिखता है और आगे बढ़ जाता है। उसके लिए मरीज एक “केस” होता है। एक नंबर, एक फ़ाइल। उसकी आवाज़ में ठंडक होती है, नज़रें घड़ी पर टिकी रहती हैं और शब्दों में जल्दबाज़ी। वह सही हो सकता है, कुशल हो सकता है, लेकिन उसका इलाज सिर्फ़ शरीर तक पहुँचता है दिल तक नहीं। मरीज उसके पास से उठता है तो शरीर में दवा तो होती है, लेकिन दिल में एक खालीपन, एक ठेस।
लेकिन एक अच्छा डॉक्टर इंसान देखता है। वह मरीज के चेहरे पर दर्द पढ़ता है, उसकी आँखों में डर को पहचानता है। वह धीरे से हाथ थामता है, मुस्कुराकर कहता है।
“चिंता मत कीजिए, मैं हूँ ना आपके साथ। सब ठीक हो जाएगा।” वह मरीज का नाम लेकर पुकारता है, उसकी बात पूरी सुनता है, और जवाब में प्रेमपूर्वक समझाता है जैसे कोई अपना समझा रहा हो। उसकी आवाज़ में करुणा होती है, व्यवहार में सम्मान। वह जानता है कि दवा के साथ-साथ आशा एक दवा है और वो आशा वह स्वयं होता है। मरीज उसके पास से उठता है तो दिल में एक नई रोशनी लेकर, एक नई हिम्मत लेकर।
अच्छा डॉक्टर समझता है कि अस्पताल सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता का आश्रय स्थल है जहाँ हर आंसू को पोंछा जाना चाहिए, हर डर को गले लगाया जाना चाहिए। वहाँ हर शब्द एक घाव भर सकता है या नया घाव दे सकता है।
डॉ. जनक राज का कहना है कि आज का शिक्षित और जागरूक समाज यही माँग कर रहा है कि हमारे अस्पतालों में सिर्फ़ मशीनें और दवाइयाँ नहीं, बल्कि संवेदनशील दिल और सम्मानजनक शब्द भी हों। यह समय है आत्ममंथन का, सुधार का क्योंकि जब तक स्वास्थ्यकर्मी एक-दूसरे के और मरीजों के प्रति करुणा नहीं दिखाएँगे, तब तक सच्चा उपचार पूर्ण रुप से परिभाषित नहीं हो सकेगा।
आइए, हम सब मिलकर अस्पतालों को फिर उस मुकाम पर ले जाएँ जहाँ इंसान सिर्फ़ स्वस्त होने नहीं, बल्कि सम्मानित एवम् सुरक्षित महसूस करे।
क्योंकि अन्ततः इलाज सिर्फ़ शरीर का नहीं, मन का भी है। इंसानियत और करुणा जिसकी सच्ची दवा है।
