एएम नाथ। चम्बा : शनिवार सुबह एक कार हादसे में चम्बा और चुराह के मशहूर सिंगर जगदीश सोनी सड़क पर दर्द से कराह रहे थे। वह पल ऐसा था, जब इंसानियत को सबसे पहले आगे आना चाहिए था। लेकिन अफसोस, कुछ लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाने के बजाय मोबाइल निकाल लिया। किसी ने वीडियो बनाना शुरू किया, कोई सवाल पूछने लगा मानो सामने कोई जख्मी इंसान नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के लिए कोई (कंटेंट) पड़ा हो।
यह दृश्य सिर्फ एक हादसे की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते चेहरे का आईना है। तकनीक ने हमें जोड़ा जरूर है, लेकिन संवेदना कहीं पीछे छूटती जा रही है। आज किसी की पीड़ा भी लाइक्स, व्यूज़ और फॉलोअर्स की दौड़ में बदल दी जाती है।
सोचने वाली बात यह है कि क्या उस वक्त किसी ने यह सोचा कि अगर समय पर मदद मिल जाती तो पीड़ा कम हो सकती थी? क्या किसी ने यह महसूस किया कि कैमरे के उस पार भी एक परिवार है, जो किसी अनहोनी की खबर से टूट सकता है?
कानून और प्रशासन बार-बार अपील करते हैं कि हादसे के समय सबसे पहले घायलों की मदद करें, एंबुलेंस बुलाएं, पुलिस को सूचना दें। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि संवेदना की जगह जिज्ञासा और वायरल होने की चाह ने ले ली है।
आज सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि लोगों ने वीडियो क्यों बनाए, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। अगर दर्द से कराहता इंसान भी हमें इंसान नहीं दिखता, तो फिर समाज कहलाने का नैतिक अधिकार हमें किसने दिया? जरूरत है आत्ममंथन की।
