चंडीगढ़ : होली के मौके पर एक नाम बरबस चर्चा में आता है. वह है-होला मोहल्ला. पूरे देश ही नहीं दुनिया के अनेक हिस्सों में यह नाम बार-बार सामने आता है. जहां-जहां सिख समुदाय के लोग निवास कर रहे हैं, वहां-वहां होला मोहल्ला चर्चा में रहता है। इसकी भी तैयारियां होती हैं. पूरे साल इंतजार रहता है, ठीक होली की तरह. बस रूप-स्वरूप समय के साथ बदल रहा है, जैसे बाकी त्योहारों का बदल रहा है।
आइए जानते हैं, कैसे शुरू हुआ सिख समुदाय का होला मोहल्ला? क्या मुगलों को जवाब देने के लिए इसकी नींव रखी गई? क्या-क्या होता है इसमें?
कब हुई होला मोहल्ला की शुरुआत?
होला मोहल्ला की शुरुआत सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने की थी. इसकी नींव साल 1701 में पंजाब के आनंदपुर साहिब में रखी गई थी. गुरु साहिब ने होली के अगले दिन इस उत्सव को मनाने की परंपरा शुरू की. उस समय भारत पर मुगलों का शासन था. मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे।
गुरु गोविंद सिंह जी.
गुरु गोविंद सिंह जी चाहते थे कि सिख समुदाय केवल भक्ति तक सीमित न रहे, बल्कि वे अपनी रक्षा के लिए शस्त्र चलाने में भी निपुण बनें. होली का त्योहार पारंपरिक रूप से केवल रंगों और हंसी-मजाक का पर्व था. गुरु साहिब ने इसे एक नया रूप दिया. उन्होंने इसे होला मोहल्ला नाम दिया. होला शब्द हल्ला’से निकला है, जिसका अर्थ है हमला करना. मोहल्ला का अर्थ है वह स्थान जहां सेना का पड़ाव हो या कोई जुलूस निकले. इसीलिए सिख धर्म में होला मोहल्ला का बहुत अधिक महत्व है. यह पर्व न केवल रंगों का त्योहार है, बल्कि यह वीरता, साहस और सैन्य शक्ति का भी प्रतीक है।
क्या मुगलों को जवाब देने के लिए इसकी नींव रखी गई?
हां, यह कहना काफी हद तक सही है. होला मोहल्ला की नींव रखने के पीछे मुख्य उद्देश्य सिखों को एक सैन्य शक्ति के रूप में तैयार करना था. मुगलों के दमनकारी शासन का मुकाबला करने के लिए सिखों का शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना जरूरी था।
मुगल बादशाह औरंगजेब :
गुरु गोविंद सिंह जी ने महसूस किया कि समाज में फैली कायरता को दूर करने के लिए वीरता के प्रदर्शन की आवश्यकता है. उन्होंने सिखों को घुड़सवारी, तलवारबाजी और कुश्ती जैसे युद्ध कौशल सीखने के लिए प्रेरित किया. होला मोहल्ला के माध्यम से वे मुगलों को यह संदेश देना चाहते थे कि सिख अब किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हैं. इस उत्सव के दौरान सिख योद्धा अपनी युद्ध कला का प्रदर्शन करते थे. इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता था और एकता की भावना पैदा होती थी. यह एक तरह का सैन्य अभ्यास था जिसे त्योहार का रूप दे दिया गया था।
होला मोहल्ला में क्या-क्या होता है?
होला मोहल्ला का उत्सव तीन दिनों तक चलता है. इसमें धार्मिक और वीरतापूर्ण गतिविधियों का संगम देखने को मिलता है।
- शस्त्र प्रदर्शन और गतका: इस त्योहार का सबसे मुख्य आकर्षण गतका है. यह सिखों की पारंपरिक युद्ध कला है. निहंग सिख नीले रंग के वस्त्र और बड़ी पगड़ियां पहनकर अपनी तलवारबाजी और लाठी चलाने के कौशल का प्रदर्शन करते हैं. वे घोड़ों पर सवार होकर हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं।
- नगर कीर्तन और जुलूस: आनंदपुर साहिब में एक विशाल जुलूस निकाला जाता है. इसे मोहल्ला कहा जाता है. इसमें पंज प्यारे सबसे आगे चलते हैं. गुरु ग्रंथ साहिब जी की पालकी को फूलों से सजाया जाता है. श्रद्धालु कीर्तन करते और जयकारे लगाते हुए साथ चलते है।
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- निहंग सिखों की भूमिका: होला मोहल्ला में निहंग सिखों का विशेष स्थान है. वे गुरु की लाडली फौज माने जाते हैं. वे अपने पारंपरिक हथियारों जैसे चक्र, कृपाण और ढाल के साथ इस उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं. उनकी वीरता और अनुशासन देखने लायक होता है।
- लंगर की सेवा: सिख धर्म में लंगर का बहुत महत्व है. होला मोहल्ला के दौरान लाखों लोगों के लिए चौबीसों घंटे लंगर चलता है. अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का भेदभाव भूलकर सभी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं. यह सेवा भावना का अद्भुत उदाहरण है।
- धार्मिक दीवान और कविता पाठ: गुरुद्वारों में विशेष धार्मिक दीवान सजाए जाते हैं. यहाँ गुरुबाणी का पाठ होता है. कवि दरबार का आयोजन किया जाता है, जहां वीर रस की कविताएँ पढ़ी जाती हैं. ये कविताएँ लोगों में जोश और उत्साह भर देती हैं।
आनंदपुर साहिब का महत्व
होला मोहल्ला का मुख्य केंद्र आनंदपुर साहिब है. यहीं पर गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. इस पावन धरती पर आज भी वही पुराना जोश देखने को मिलता है. देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ मत्था टेकने आते हैं. पूरा शहर ‘बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के जयकारों से गूंज उठता है।
होली और होला मोहल्ला में अंतर
होली में लोग एक-दूसरे पर रंग और गुलाल डालते हैं. होला मोहल्ला में भी रंगों का प्रयोग होता है, लेकिन यहां मुख्य जोर शक्ति प्रदर्शन पर होता है. होली जहां आपसी प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है, वहीं होला मोहल्ला वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक है. गुरु साहिब ने होली के कोमल रंगों में वीरता का रंग घोल दिया था।
होला मोहल्ला केवल एक मेला नहीं है, बल्कि यह सिखों के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है. गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी सिखों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है. यह उत्सव संदेश देता है कि बुराई के खिलाफ लड़ने के लिए साहस और एकता अनिवार्य है. आज के समय में भी होला मोहल्ला का महत्व कम नहीं हुआ है. यह अनुशासन, सेवा और वीरता का मार्ग दिखाता है।
