21 अप्रैल 2026 को बने वैरिफिकेशन कागज़, 7½ महीने पहले संभाल ली कुर्सी .. जोगिन्द्रा बैंक के चेयरमैन मुकेश शर्मा पर बड़ा खुलासा

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एएम नाथ। सोलन : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने आरोप लगाया है कि जोगिन्द्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन के चेयरमैन मुकेश शर्मा ने बैंक के संसाधनों, वाहनों और सार्वजनिक धन का कथित रूप से निजी एवं राजनीतिक हितों के लिए दुरुपयोग किया। शिकायत में कहा गया है कि 15 सितंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी किए बिना ही वे लगभग साढ़े सात महीने तक चेयरमैन पद पर बने रहे। आरोप है कि आरसीएस शिमला के अधिकारियों ने इस कथित अनियमितता को जानबूझकर दबाए रखा और बाद में अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा के द्वारा आर टी आई लगाने के बाद आर सी एस शिमला के साथ सांठगांठ करके 21 अप्रैल 2026 को दस्तावेज तैयार कर 22 अप्रैल 2026 को डायरी नंबर 3036/पृष्ठ 127 के माध्यम से जमा करवाकर पूरे मामले को वैध दिखाने का प्रयास किया गया। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा का कहना है कि यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सुनियोजित संस्थागत मिलीभगत की ओर संकेत करता है।

जोगिन्द्रा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, सोलन में कथित रूप से चल रहे करोड़ों रुपये के एनपीए घोटाले, वित्तीय हेरफेर और बैंकिंग नियमों की खुली अनदेखी को लेकर अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा द्वारा लगातार किए जा रहे खुलासों ने हिमाचल प्रदेश के सहकारी बैंकिंग तंत्र में भारी हलचल पैदा कर दी है। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बैंक के नामित चेयरमैन मुकेश शर्मा, प्रबंध निदेशक पंकज सूद, एजीएम, कुलदीप सिंह, एजीएम, राम पॉल, एजीएम, हरीश शर्मा, एजीएम, गुरमीत सिंह, एसएम, रविंद्र कुमार तथा कई शाखा प्रबंधकों ने आरसीएस शिमला, नाबार्ड शिमला और आरबीआई शिमला के कुछ संबंधित अधिकारियों के कथित संरक्षण में वर्षों से एनपीए खातों में बड़े स्तर पर अवैध हेरफेर किया है। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा का आरोप है कि बैंक के एन पी ए खातों को “प्रोविजनिंग”, “राइट ऑफ” और “वन टाइम सेटलमेंट (OTS)” योजनाओं के माध्यम से संदिग्ध तरीके से समायोजित कर वास्तविक एनपीए को छिपाया गया तथा बैंक की बैलेंस शीट को कृत्रिम रूप से मजबूत दिखाने का प्रयास किया गया।
अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा द्वारा विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों को भेजी गई शिकायतों में दावा किया गया है कि 31 मार्च 2025 तक बैंक का एनपीए 35.46 करोड़ रुपये था, जबकि 26 दिसंबर 2025 तक वास्तविक एनपीए 60 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका था। इसके बावजूद मार्च 2026 में चेयरमैन मुकेश शर्मा ने मीडिया में बड़े-बड़े दावे करते हुए एनपीए को 19 करोड़ रुपये तक लाने की बात कही। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा का कहना है कि यह दावा केवल “विंडो ड्रेसिंग” और “फर्जी वित्तीय प्रस्तुति” का हिस्सा था, क्योंकि 31 मार्च 2026 तक भी वास्तविक एनपीए 40 करोड़ रुपये से अधिक रहा, जो बैंक के स्वयं के लक्ष्य 30.58 करोड़ रुपये से लगभग 10 करोड़ रुपये अधिक बताया गया। शिकायतों के अनुसार अप्रैल 2026 के अंत तक बैंक का एनपीए पुनः बढ़कर 55 करोड़ रुपये से अधिक हो गया, जिससे कथित रूप से यह साबित होता है कि एनपीए आंकड़ों में बनावटी कमी दिखाने के लिए संदिग्ध ओटीएस, विंडो ड्रेसिंग, अवैध राइट ऑफ और फर्जी समायोजन किए गए।
अधिवक्ता शर्मा ने यह भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि बैंक में “सस्पेंस इंटरेस्ट” को आज तक मैनुअल रूप में रखा गया ताकि CBS प्रणाली लागू होने के बावजूद वास्तविक ब्याज देनदारियां रिकॉर्ड में सामने न आ सकें और एनपीए कम दिखाया जा सके। अधिवक्ता शर्मा ने आरोप लगाया है कि कई प्रभावशाली व अपने जान पहचान के डिफॉल्टरों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए शाखा प्रबंधकों पर दबाव बनाकर फर्जी मूल्यांकन रिपोर्टें तैयार करवाई गईं और नियमों के विरुद्ध करोड़ों रुपये के खातों को पहले “प्रोविजनिंग” में डाला गया, फिर उन्हें राइट ऑफ अथवा ओटीएस के माध्यम से समाप्त दिखा दिया गया। शिकायतों के अनुसार इस कथित खेल से बैंक, जमाकर्ताओं, बैंक कर्मचारियों और शेयरधारकों को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचा।
शिकायतों में यह भी कहा गया है कि बैंक प्रबंधन द्वारा विज्ञापनों, अनावश्यक बैठकों, प्रोटोकॉल, पार्टियों, उपहारों और अन्य सुविधाओं पर भारी खर्च किया गया, जबकि बैंक की वास्तविक वित्तीय स्थिति लगातार खराब होती रही। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने आरोप लगाया है कि आरसीएस शिमला, नाबार्ड शिमला और आरबीआई शिमला के कुछ अधिकारी वर्षों से इन कथित अनियमितताओं पर आंखें मूंदे बैठे रहे और उन्होंने अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग करने के बजाय बैंक प्रबंधन को संरक्षण प्रदान किया। शिकायतों के अनुसार यदि वर्ष 2005 से अब तक बैंक के एनपीए खातों, प्रोविजनिंग, राइट ऑफ, ओटीएस समझौतों और सस्पेंस इंटरेस्ट की स्वतंत्र फोरेंसिक जांच करवाई जाए तो करोड़ों रुपये के बड़े वित्तीय घोटाले उजागर हो सकते हैं।
इन आरोपों के सामने आने के बाद सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। विभिन्न कर्मचारी संगठनों, जमाकर्ताओं और सामाजिक संगठनों द्वारा पूरे मामले की सीबीआई, विजिलेंस अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग उठाई जा रही है। अधिवक्ता मुकेश कुमार शर्मा ने कहा है कि यदि समय रहते पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं करवाई गई तो इससे न केवल सार्वजनिक धन को भारी नुकसान होगा बल्कि जोगिंद्रा बैंक सोलन का हाल बघाट बैंक से भी बुरा होगा और भी सहकारी बैंकिंग व्यवस्था में जनता का विश्वास भी पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

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