24 साल बाद न्याय …9.16 करोड़ मुआवजा : कार की टक्कर से कानों से बहरे और मस्तिष्क की नसें क्षतिग्रस्त – हाईकोर्ट ने बढ़ाई मुआवजा राशि

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चंडीगढ़ :  कार की टक्कर से कानों से बहरे और मस्तिष्क की नसें क्षतिग्रस्त होने पर दो दशकों से अधिक समय से नारकीय जीवन जी रहे जालंधर निवासी वकील नरिंदर पाल सिंह को 9,16,81,844 का मुआवजा मिलेगा।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना के एक बेहद मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए मुआवजा राशि को बढ़ा दिया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की एकलपीठ ने नरिंदर पाल को मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण द्वारा 2008 में दिए गए 52 लाख के मुआवजे को बढ़ाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि करीब 24 वर्षों से नरकीय जीवन जी रहे पीड़ित के लिए यह राशि केवल एक संख्या नहीं, बल्कि उसकी गरिमा और भविष्य के उपचार के लिए आवश्यक संबल है  । हादसा 13 अक्टूबर 2002 को हुआ था। जालंधर में तेज रफ्तार कार ने गलत दिशा से आकर नरिंदर पाल सिंह के स्कूटर को टक्कर मार दी थी। उस समय नरिंदर की उम्र मात्र 26 वर्ष थी और वह एक उभरते हुए वकील थे।

हादसे में नरिंदर के सिर और कंधे पर गंभीर चोटें आईं और परिणामस्वरूप वे 100 प्रतिशत स्थायी विकलांगता के शिकार हो गए। अदालत में पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, नरिंदर पाल सिंह आज भी दोनों कानों से पूरी तरह बहरे हैं और मस्तिष्क की नसें स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो गई हैं। वे निरंतर कानों में गूंजने वाली आवाजों, चक्कर आने, अनिद्रा और गंभीर अवसाद से जूझ रहे हैं। अदालत ने पाया कि भारत के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों में इलाज के बावजूद उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।  पीजीआई चंडीगढ़ और अन्य विशेषज्ञों ने राय दी कि उनकी जटिल न्यूरो-ब्रेन सर्जरी और कोक्लियर इम्प्लांट के लिए अमेरिका के मेयो क्लिनिक जैसे संस्थानों में उन्नत चिकित्सा की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने अतिरिक्त साक्ष्य के आधार पर माना कि भविष्य में विदेशी उपचार के लिए भारी खर्च अनिवार्य है, जिसे देखते हुए केवल ‘विदेशी उपचार’ मद के तहत छह करोड़ की राशि निर्धारित की गई है।

  • आय की हानि के लिए 1.14 करोड़
  • पूर्व में हुए चिकित्सा खर्च के लिए 37.17 लाख
  • शारीरिक दर्द और मानसिक पीड़ा के लिए 30 लाख
  • शादी की संभावनाओं के खत्म होने के लिए 6 लाख
  • विशेष रूप से पीड़ित की 24 घंटे देखभाल के लिए दो सहायकों (अटेंडेंट्स) की आवश्यकता को देखते हुए 1.22 करोड़ की राशि आवंटित की गई है।

कोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह बढ़ी हुई राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दे। बीमा कंपनी की लापरवाही की दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रीमियम के रूप में एकत्र किया गया सार्वजनिक धन ऐसे ही पीड़ितों की मदद के लिए होता है। फैसले के अंत में अदालत ने भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मुआवजा न केवल अतीत के घावों को भरने के लिए है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए है कि पीड़ित को भविष्य में बिना किसी अभाव के जीवन जीने का हक मिले।

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