3 वर्षों में 9,393 किसानों ने अपनाई प्राकृतिक खेती : प्राकृतिक खेती को मिला ‘गारंटी का बाजार’, हिमाचल में बढ़ रहा किसानों का भरोसा

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सुक्खू सरकार की पहल से मिला नया संबल, गेहूं, मक्की और हल्दी की सरकारी खरीद और बढ़े एमएसपी से मजबूत हुआ किसानों का विश्वास
ऊना बना सकारात्मक बदलाव का उदाहरण, तीन वर्षों में 9,393 किसानों ने अपनाई प्राकृतिक खेती
रोहित जसवाल। ऊना, 14 जून. हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती तेजी से किसानों की पसंद बन रही है। सरकारी खरीद, बढ़े हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और ‘गारंटी के बाजार’ की व्यवस्था ने किसानों की उपज की बिक्री और उचित मूल्य को लेकर वर्षों पुरानी चिंता को काफी हद तक दूर कर दिया है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार की यह पहल प्राकृतिक खेती को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी एक व्यवहारिक और लाभकारी विकल्प के रूप में स्थापित कर रही है।
एक समय था जब प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी उपज के लिए उचित बाजार और बेहतर मूल्य प्राप्त करना था। किसानों को यह चिंता सताती थी कि रासायनिक खेती से अलग रास्ता चुनने के बाद उनकी उपज को खरीदार मिलेगा भी या नहीं। प्राकृतिक गेहूं, मक्की और हल्दी की सरकारी खरीद तथा बेहतर समर्थन मूल्य उपलब्ध करवाने से किसानों को अब अपनी उपज का सुनिश्चित ‘गारंटी का बाजार’ मिला है।
*एमएसपी ने बढ़ाया किसानों का आत्मविश्वास*
सुक्खू सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। सरकार ने प्राकृतिक गेहूं का एमएसपी 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम, प्राकृतिक मक्की का 40 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये प्रति किलोग्राम, पांगी घाटी के जौ का 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम तथा प्राकृतिक हल्दी का 90 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया है। वहीं, पहली बार प्राकृतिक अदरक को भी एमएसपी के दायरे में लाते हुए 30 रुपये प्रति किलोग्राम का समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया है। सरकार के इस फैसले ने प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को अपनी उपज के लिए सुनिश्चित बाजार और बेहतर मूल्य का भरोसा दिया है। सरकारी खरीद व्यवस्था ने प्राकृतिक खेती को व्यवहारिक और लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही कारण है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
*ऊना बना सकारात्मक बदलाव का उदाहरण*
प्राकृतिक खेती के बढ़ते प्रभाव का एक सशक्त उदाहरण जिला ऊना में देखने को मिल रहा है। पिछले तीन वर्षों के दौरान जिले के 9,393 किसान राजीव गांधी प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत प्राकृतिक खेती से जुड़े हैं। यह संख्या दर्शाती है कि यदि किसानों को बाजार और मूल्य की सुरक्षा मिले तो वे नई कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए तैयार हैं।
आत्मा परियोजना ऊना की निदेशक प्यारो देवी के अनुसार, इस वर्ष जिले में 111 किसानों से 520 क्विंटल प्राकृतिक गेहूं की खरीद 80 रुपये प्रति किलोग्राम के एमएसपी पर की जा रही है। इसके लिए लगभग 41.60 लाख रुपये की राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में हस्तांतरित की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार की यह पहल किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है तथा उन्हें उनकी मेहनत का उचित मूल्य सुनिश्चित कर रही है।
पिछले वर्ष जिले में 39 किसानों से 416 क्विंटल प्राकृतिक गेहूं 60 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा गया था, जिसके एवज में किसानों को 25.83 लाख रुपये का भुगतान सीधे उनके खातों में किया गया। इसी प्रकार 33 किसानों से 196.43 क्विंटल प्राकृतिक मक्की 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदी गई, जिसके लिए 8.25 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इसके अलावा 6.42 क्विंटल प्राकृतिक हल्दी 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदी गई, जिसके बदले किसानों को 96,300 रुपये की राशि प्रदान की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए नीति, खरीद और भुगतान—तीनों स्तरों पर प्रभावी पहल कर रही है।
*किसानों की जुबानी बदलाव की कहानी*
गगरेट विकासखंड के मरवाड़ी गांव के प्रगतिशील किसान जोगिन्द्रपाल शर्मा प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती उत्पादों के एमएसपी में बढ़ोतरी किसानों के लिए बड़ा संबल बनी है। पिछले वर्ष उन्होंने 40 क्विंटल गेहूं 60 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा था, जबकि इस वर्ष 30 क्विंटल गेहूं 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से विक्रय हुआ है। उनके अनुसार, बेहतर मूल्य मिलने से किसानों का प्राकृतिक खेती के प्रति विश्वास बढ़ा है और अधिक लोग इस पद्धति को अपना रहे हैं।
ग्राम पंचायत लठियानी के भंजाल गांव की महिला किसान अनिता कुमारी बताती हैं कि शुरुआती वर्षों में उत्पादन अपेक्षाकृत कम रहा, लेकिन प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और अनुभव के साथ उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुआ। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती उत्पादों के लिए बढ़ा हुआ एमएसपी किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
टकारला गांव के किसान प्रकाश चंद शर्मा पिछले तीन वर्षों से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रारंभ में वह सीमित भूमि पर प्राकृतिक खेती करते थे, लेकिन बेहतर उत्पादन और आकर्षक एमएसपी मिलने से उन्होंने इसके दायरे का विस्तार किया है। पिछले वर्ष उन्होंने 11 क्विंटल गेहूं 60 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा था, जबकि इस वर्ष 15 क्विंटल गेहूं 80 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा है। इससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
*सरकारी खरीद और एमएसपी में निरंतर बढ़ोतरी ने रखी जिले में सकारात्मक बदलाव की नींव : डीसी जतिन लाल*
उपायुक्त ऊना जतिन लाल का कहना है कि मुख्यमंत्री श्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के निर्देशानुसार जिले में किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए तत्परता से प्रयास किए जा रहे हैं। उत्पादों की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने और एमएसपी में निरंतर बढ़ोतरी की नीति ने जिले में सकारात्मक बदलाव की नींव रखी है। किसान अब आत्मविश्वास के साथ प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। यह पहल किसानों की आर्थिक समृद्धि, टिकाऊ कृषि और स्वस्थ भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।
*आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरण संरक्षण*
उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और सुरक्षित खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देने वाली एक टिकाऊ कृषि पद्धति के रूप में उभर रही है। इसके बढ़ते दायरे से जल, मिट्टी और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिल रहा है।
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