40 दिन की थी तब सेना में हुई शामिल ताशा : 4 महीने तक नक्सलियों से लड़ी. अब हैंडलर की मौत से सदमे में ‘ताशा’

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मध्य प्रदेश के बालाघाट से नक्सलवाद अब पूरी तरह खत्म हो चुका है. इसमें जितना जवानों का योगदान है, उतना ही योगदान पुलिस के डॉग स्कवॉड का भी है. उन्हीं में से एक है फीमेल डॉग ताशा और उनके मास्टर विनोद।

ताशा और उनके मास्टर विनोद ने बालाघाट में भी काम किया. ताशा आगे चलती और उनके पीछे फोर्स बेखौफ होकर आगे बढ़ती. लेकिन अब उनके हैंडलर विनोद शर्मा की 10 दिसंबर को हुए सड़क हादसे में मौत हो गई. उसके बाद से ताशा सदमें में है. 18 दिसंबर को ताशा का जन्मदिन मनाया गया लेकिन ताशा की नजरें अपने हैंडलर विनोद शर्मा को ही खोजती रहीं।

फीमेल डॉग ताशा महज 40 दिन की थी तब से वह 23वीं बटालियन एसएएफ में है. वह 18 दिसंबर 2018 से ही मास्टर विनोद शर्मा के साथ थी. यानी की तब से लेकर अब तक ऐसा कोई दिन नहीं रहा, जब विनोद शर्मा से दूर रही हो. ऐसे में ताशा का उनके हैंडलर विनोद से गहरा अटैचमेंट था. अब उनके दुनिया से चले जाने के बाद से वह खोई-खोई रहती है. उसकी ट्रेनिंग, खाना-खेलना और काम करना सब कुछ विनोद के साथ ही हुआ. ताशा के लिए विनोद सिर्फ हैंडलर नहीं बल्कि पेरेंट्स थे।

बच्चों की तरह प्यार करते विनोद

विनोद के साथी बताते हैं कि वो ताशा को बेहद प्यार करते थे. ताशा के लिए विनोद अपनी जेब से पैसे खर्च कर दवाइयां, खिलौने और कपड़े लाते थे. वहीं, दूसरे हैंडलर अपनी डॉग को सिर्फ सुबह शाम घूमाते थे लेकिन वह दिन में 8 से 10 बार उसे बाहर लाते और उसके साथ खेलते थे. वह ताशा को अपने बच्चों की तरह ही पालते थे।

महीने भर के नक्सल विरोधी अभियान से ड्यूटी कर 10 दिसंबर को विनोद शर्मा और उनके तीन साथी मुरैना लौट रहे थे. तभी नेशनल हाइवे 44 पर काम चल रहा था. ऐसे में घटना स्थल से करीब डेढ़ किलोमीटर पहले ही वन-वे शुरु हुआ. ऐसे में सामने आ रहा कंटेनर उन्हें दिखा नहीं और दोनों वाहनों में टक्कर हो गई. इसमें ताशा के हैंडलर विनोद सहित तीन जवानों की मौत हो गई. उसी सैना की गाड़ी में पीछे पिंजरे में ताशा थी. इस हादसे में वह सही सलामत रही लेकिन उनके हैंडलर की मौत के बाद वह सदमें चली गई है।

नक्सल मुक्त अभियान में रही साथ

नक्सलियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चल रही थी, तब ताशा और उनके हैंडलर विनोद शर्मा बालाघाट में पोस्टेड थे. ऐसे में वह करीब 1 महीना बालाघाट में रहे और जंगलों की खाक छानी. ऐसे में वह रात के अंधेरे में फोर्स सर्चिंग के लिए जाती थी. तब ताशा आगे-आगे चलकर जवानों को राह दिखाती थी. किसी भी खतरे को महसूस कर फोर्स को आगाह करती थी. लेकिन अब वह सदमें में है लेकिन नए हैंडलर उसे उबारने की कोशिश कर रहे हैं. अब ताशा को किसी नए ऑपरेशन की जिम्मेदारी भी नहीं दी जा रही है।

‘उसके दिमाग से यादें मिटाना एक चुनौती’

23वीं बटालियन के टीआई केसर सिंह, जो डॉग स्क्वॉड के प्रभारी हैं. उन्होंने बताया कि ताशा 40 दिन की उम्र से एक ही हैंडलर के साथ थी. अब वह नहीं रहे, तो इसकी साइकोलॉजी पर गहरा असर पड़ना स्वाभाविक है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह उस हादसे की चश्मदीद है. उसके दिमाग से उन भयानक यादों को मिटाना हमारे लिए सबसे बड़ा काम है।

उन्होंने बताया कि फिलहाल ताशा को कुछ दिनों के लिए किसी भी ऑपरेशनल काम से दूर रखा जाएगा. एक नए हैंडलर को सिर्फ इसी काम पर लगाया गया है कि वह ताशा के साथ खेले, उसका ध्यान रखे, उसकी साफ-सफाई करे और उसे पुरानी यादों से बाहर निकालने में मदद करे।

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