हिमाचल में लंपी वायरस का बढ़ता प्रकोप, 2500 से अधिक पशु संक्रमित, 90 की मौत

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ऊना और सिरमौर  में सबसे ज्यादा असर, पशुपालन विभाग ने तेज किया टीकाकरण अभियान

रोहित जसवाल। ऊना/  शिमला। हिमाचल प्रदेश में लंपी वायरस का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदेश में अब तक करीब 2,500 पशु संक्रमित हो चुके हैं, जबकि लगभग 90 पशुओं की मौत हो चुकी है। बीमारी का सबसे अधिक प्रभाव सिरमौर और ऊना जिलों में देखने को मिल रहा है। इसके अलावा सोलन, बिलासपुर, हमीरपुर और मंडी सहित अन्य जिलों में भी संक्रमण के मामले सामने आए हैं।

संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए पशुपालन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। बीमारी को नियंत्रित करने के लिए प्रदेशभर में टीकाकरण अभियान युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा है। विभाग की टीमें गांव-गांव पहुंचकर पशुओं का टीकाकरण कर रही हैं।

अब तक 10,382 पशुओं को लंपी रोग से बचाव की वैक्सीन लगाई जा चुकी है।

जर्सी गाय, बैल और बछड़ों में अधिक संक्रमण

पशुपालन विभाग के अनुसार जर्सी नस्ल की गायों, बैलों और बछड़ों में संक्रमण का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक देखा जा रहा है, जबकि स्थानीय नस्ल के पशुओं में संक्रमण के मामले कम हैं।

विभाग ने पशुपालकों को सतर्क रहने की सलाह दी है। यदि किसी पशु में त्वचा पर गांठें, तेज बुखार, कमजोरी या अन्य संदिग्ध लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करने की अपील की गई है।

सिरमौर में सबसे ज्यादा मामले

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सिरमौर जिले में 2,064 गोवंश संक्रमित पाए गए हैं, जिनमें से 47 पशुओं की मौत हो चुकी है।

वहीं ऊना जिले में 438 पशु संक्रमित पाए गए, जिनमें से 257 स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि 21 पशुओं की मौत हुई है।

बिलासपुर में 169 संक्रमित पशुओं में से 94 पशु स्वस्थ हो चुके हैं और आठ की मौत हुई है। मंडी जिले में 55 मामले सामने आए हैं, जहां एक पशु की मौत की सूचना है। चंबा जिले में भी तीन पशुओं की मौत की जानकारी सामने आई है।

पशुपालकों से सहयोग की अपील

पशुपालन विभाग ने पशुपालकों से अपील की है कि वे टीकाकरण अभियान में पूरा सहयोग करें और अपने पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं। विभाग ने कहा है कि बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर पशुपालक स्वयं उपचार करने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लें।

क्या है लंपी रोग?

लंपी एक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से गोवंशीय पशुओं को प्रभावित करती है। इस बीमारी में पशु की त्वचा पर और त्वचा के नीचे गांठें बन जाती हैं। इसके अलावा बुखार, कमजोरी और भूख कम लगने जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार बीमारी की समय पर पहचान, संक्रमित पशुओं को अन्य पशुओं से अलग रखना, उचित उपचार और टीकाकरण से संक्रमण को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

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