राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर के फैसले पर सियासी विवाद; विपक्ष ने संस्कृति और खानपान की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया
केरल। केरल के नए राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर के पदभार संभालने के बाद राजभवन की रसोई में मांसाहारी भोजन नहीं बनाने के कथित आदेश को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस और माकपा (सीपीएम) ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए इसे राज्य की खानपान संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर सवाल उठाए हैं।
राज्यपाल की रसोई में केवल शाकाहारी भोजन
प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर ने निर्देश दिया है कि राजभवन की रसोई में मांसाहारी भोजन न बनाया जाए और न ही परोसा जाए। बताया गया है कि राज्यपाल स्वयं शाकाहारी हैं और इसी कारण उन्होंने अपनी रसोई में शाकाहारी भोजन की व्यवस्था रखने का फैसला किया है।
वहीं, लोक भवन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस व्यवस्था को कर्मचारियों के खानपान पर प्रतिबंध के रूप में लागू नहीं किया गया है। कर्मचारियों को अपनी पसंद का भोजन घर से लाने और निर्धारित स्थान पर बैठकर खाने की छूट है।
कांग्रेस ने संस्कृति पर हमले का लगाया आरोप
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि केरल की अपनी विशिष्ट खानपान संस्कृति है, जिसमें मछली और अन्य मांसाहारी व्यंजन प्रमुख स्थान रखते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी पसंद का भोजन चुनने की स्वतंत्रता है और इस पर किसी तरह का प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि इस तरह के फैसलों के माध्यम से भगवाकरण और संघ परिवार के एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से राज्य की सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने की अपेक्षा की जाती है।
सीपीएम ने भी जताई आपत्ति
सीपीएम के राज्य सचिव एमवी गोविंदन ने भी इस मामले पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि भारत में नागरिकों को लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हैं और भोजन को सांप्रदायिक विवाद का विषय बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
विवाद के बीच लोक भवन से जुड़े सूत्रों ने स्पष्ट किया कि व्यवस्था का उद्देश्य राज्यपाल की व्यक्तिगत खानपान संबंधी पसंद के अनुरूप रसोई का संचालन करना है। कर्मचारियों के भोजन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
इस फैसले को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर व्यक्तिगत खानपान की पसंद, क्षेत्रीय संस्कृति और संवैधानिक पदों की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
