मारपीट के मामले में एक साल की कैद और 2 हजार रुपये जुर्माने की सजा कायम
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल गंभीर आरोप लगा देना किसी व्यक्ति का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को आरोपों को संदेह से परे साबित करना होता है। अदालत ने नाबालिग से कथित कुकर्म के मामले में आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, मारपीट के मामले में सुनाई गई एक साल की कैद और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा को भी कायम रखा।
जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस रविंदर मलिक की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट का आकलन किया। यह मामला पंजाब के बठिंडा जिले के मौड़ थाना क्षेत्र का है।
13 वर्षीय पौत्र से कुकर्म का लगाया था आरोप
शिकायतकर्ता ने 30 जुलाई 2016 को पुलिस को शिकायत दी थी कि उनके 13 वर्षीय पौत्र के साथ 27 जुलाई को कथित तौर पर कुकर्म किया गया। शिकायत के अनुसार, बाद में दोबारा आमना-सामना होने पर आरोपी ने बच्चे की पिटाई भी की।
ट्रायल कोर्ट ने कुकर्म के आरोप को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए और आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। हालांकि, भारतीय दंड संहिता की धारा 325 के तहत मारपीट के मामले में उसे दोषी ठहराते हुए एक साल की कैद और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
मेडिकल रिपोर्ट में नहीं मिले स्पष्ट संकेत
हाईकोर्ट ने बच्चे की मेडिकल जांच को अहम साक्ष्य माना। डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान यौन अंगों पर खरोंच, असामान्य सूजन या लालिमा नहीं पाई गई। मेडिकल रिपोर्ट में भी कुकर्म के स्पष्ट संकेत नहीं मिले थे।
अदालत ने यह भी पाया कि घटना के बाद मेडिकल जांच और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े कुछ पहलुओं पर अभियोजन पक्ष संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका। जांच के दौरान एक नमूने में शुक्राणु पाए गए थे, लेकिन उनका डीएनए परीक्षण नहीं कराया गया। इस कारण नमूने का आरोपी से संबंध स्थापित नहीं हो सका। पुलिस ने बच्चे के अंतर्वस्त्र भी जब्त नहीं किए थे।
स्कूल जाने की तारीखों पर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि हर यौन अपराध के मामले में डीएनए साक्ष्य अनिवार्य नहीं होता, लेकिन इस मामले में उपलब्ध रिपोर्ट आरोपी से कथित अपराध का सीधा संबंध स्थापित नहीं कर सकी। अदालत ने घटनाक्रम से जुड़ी तारीखों पर भी गौर किया। रिकॉर्ड के अनुसार, बच्चा 27 और 28 जुलाई को स्कूल गया था, जबकि इन तारीखों पर स्कूल बंद होने की बात कही गई थी।
साक्ष्यों का आकलन करने के बाद हाईकोर्ट ने कुकर्म के आरोप से बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया। साथ ही, मारपीट के मामले में सुनाई गई सजा को भी बरकरार रखा।
